हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

भावांजलि - सम्पादक

 1-श्याम  त्रिपाठी ( मुख्य सम्पादक)

1982 में  श्री नीरज जी मेरी कुटिया में हिन्दी परिषद संस्था के संस्थापक एवं विश्व  भारती  साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक प्रकाशक के नेतृत्व में ब्लिट्ज़ के सम्पादक नौटियाल  जी ,प्रभा ठाकुर और नीरज  जी ने अपनी सुंदर रचनाएँ सुनाईं थी । उसके बाद वे दो -तीन बार यहाँ आए । उनके लिए श्रद्धांजलि के कुछ शब्द हिन्दी चेतना  में दिए जा रहे हैं।

 

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2-डॉ० भावना कुँअर

साहित्य मनीषी,महाकवि आदरणीय श्री गोपाल दास नीरज जी से मंचों पर ही सुनने का रिश्ता न

डॉ.भावना कुँअर

हीं था, बल्कि उनका घर में आना जाना होने से उनसे एक पारिवारिक रिश्ता भी था। उनका यूँ अचानक चले जाना पारिवारिक रिश्तों को ही नहीं पूरे साहित्यिक जगत को आहत कर गया है। उनके  गीत सदियों तक इस जहाँ में, यहाँ की वादियों  में जिंदा रहकर गूँजते रहेंगे।अपनी  जीवन यात्रा में नई पीढ़ी के लिए ,जो मार्गदर्शन नीरज जी ने किया, वह हमेशा स्मरणीय रहेगा।नीरज जी का जाना एक युग का गुज़र जाना है,एक सदी का अन्त हो जाना है।अश्रुपूरित नेत्रों से नीरज जी  को भावभीनी श्रद्धाजंलि और नमन करते हुए मेरा मन बहुत भावुक हो रहा है।

 

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3-डॉ०  कविता भट्ट

मेरी माँ ने मुझे कई बार बताया कि मेरा जन्म हमारे मिट्टी पत्थर वाले पहाड़ी घर में हुआ। मेरी माँ गानों की बहुत शौकीन हैं और उन दिनों शहर नगर गाँव -गाँव रेडियो ही मनोरंजन का

डॉ०कविता भट्ट

सर्वसुलभ साधन था। मेरे जन्म के समय रात को आकाशवाणी विविध भारती पर कार्यक्रम छायागीत चल रहा था, गीत बज रहा था , ‘शोखियों में घोला जाए , फूलों का शबाब ….’ चित्रपट था प्रेम पुजारी और गीतकार सबके प्रिय ‘नीरज’, वर्ष 1979 बसंत का मौसम ..प्रेम पुजारी 1970 में आई थी, लेकिन इस फ़िल्म के गीत हवाओं में गुंजायमान थे और सदियों तक रहेंगे। अनेक अन्य फिल्मों के लिए भी उनकी लेखनी ने विविध रंग बिखेरे। ‘मेरा नाम जोकर’ फ़िल्म  का मुक्त छन्द में लिखा गीत-‘ऐ भाई जरा देख के चलो’ भी बहुत चर्चित हुआ और जनसाधारण की जुबान पर भी चढ़ा।

‘प्यार अगर न थामता पथ में , उँगली इस बीमार उमर की

हर पीड़ा वेश्या  बन जाती , हर आँसू आवारा होता’ जैसे गीतों के रंग ही अनोखे हैं। कौन कहता है कि नीरज चले गए, उनके तराने हवाओं को हमेशा ताज़गी देते रहेंगे। नवांकुरों के प्रति इतना स्नेह था उनके मन में कि 1927 से निरंतर प्रकाशित हिंदी की सबसे पुरानी पत्रिका जिसका आरंभ गांधी जी ने किया था, उसमें पिछले वर्ष मेरा भारतीय दर्शन पर केंद्रित आलेख पढकर उन्होंने मुझे कॉल किया, मेरे आलेख की प्रशंसा की और आशीर्वाद दिया, बोले कि लिखना कभी मत छोड़ना। साहित्य ऋचा पत्रिका के कवर पर उनके चित्र के साथ मेरा चित्र और मेरी रचनाएँ भी प्रकाशित हुई थी पिछले वर्ष। उनका चित्र और दो पंक्तियाँ मैं ने अपने अध्ययन कक्ष में दो वर्ष पूर्व लगाया था, जो अभी भी जस का तस है। नीरज आप अंतिम साँस तक गुनगुनाये जाते रहोगे। वस्तुतः नीरज एक युग का नाम है- अविस्मृत !स्मृति स्वरूप उनका एक गीत यहाँ दे रही हूँ

कारवाँ गुज़र गया

गोपालदास नीरज

 स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिए धुआँ-धुआँ पहन गए,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके,
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ़ ज़मीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक़्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यों कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गए किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमुक उठे चरन-चरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पोंछ गया सिंदूर तार-तार हुईं चूनरी,
और हम अजान-से,
दूर के मकान से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

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स्मृतिशेष कवि नीरज जी के प्रति भावभीनी श्रद्धांजलि —-

शशि पाधा

खुशनुमा मौसम से खुशबू बटोरने वाले, फूलों के रंगों से शब्दों को भिगोने वाले, हवाओं के कागद पर दिल की कलम से पाती लिखने वाले, तितली के पंखों की कोमलता को बिन छुए ही बयाँ करने वाले, हम सब के प्रिय कवि, प्रसिद्ध गीतकार और उससे भी  बड़े एक अत्यंत सहृदय व्यक्ति के लिए श्रद्धांजलि देने के लिए शब्द स्वयं ही रो उठते हैं, गीत मौन हो जाते हैं और मौसम में असमय ही पतझड़ का आभास हो जाता है। अश्रुपूर्ण आँखों से विदाई देते हुए अस्फुट से स्वर निकलते हैं —‘कारवाँ गुज़र गया , गुबार देखते रहे।’ स्मृतिशेष नीरज जी के लिए मैं यही कहना चाहूँगी कि ऐसे कालजयी रचनाओं के रचयिता के  गीतों की गूँज तब तक इस सीमित आकाश में गूँजती रहेगी जब तक यह धरती रहेगी, आसमान रहेगा और रहेगा संगीत।

शत शत नमन ।

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4-रश्मि शर्मा (राँची, झारखंड)

जीवन ने यह सुअवसर नहीं दिया कि नीरज जी से मुलाक़ात हो सके,मगर उनको जानने-पहचानने के पहले उनके गीतों से परिचय था। होंठ गुनगुनाते थे बचपन से उन मधुर गीतों को, जिनके बारे में उम्र हो जाने के बाद पता लगा कि यह दिल छू लेने वाले गीतों के रचयिता महाकवि गोपालदास नीरज जी थे।उनके जाने से गूँगा हो गया हिंदी के गीतों का संसार। सदियों तक लोग आपको याद रखेंगे। बहुत पहले मेरे किशोर मन को आपके इस गीत ने बहुत छुआ था-

“मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ तुम शहज़ादी रूप नगर की

हो भी गया प्यार हम में तो बोलो मिलन कहाँ पर होगा ?”

अलविदा महाकवि नीरज, आप सदैव हमारे दिलों में रहेंगे।

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5-डॉ. शिवाजी श्रीवास्तव

नीरज जी का जाना सही अर्थों में हिंदी कविता की अपूरणीय क्षति है,वे एक ऐसे विरले कवि थे जिन्होंने हिंदी गीतों को अभिनव भंगिमा और बिम्ब प्रदान किए।सहज निर्झर की भाँति बहते हुए

डॉ.शिवजी श्रीवास्तव

उनके शब्दो की सहजता और उनमें गुँथे भाव प्रत्येक सहृदय के रस को आनन्दित करते थे।उन्होंने काव्य की प्रत्येक विधा को स्पर्श किया,अकविता,क्षणिका, हाइकु,ग़ज़ल प्रत्येक विधा में रचा।वे जितने श्रेष्ठ कवि थे उतने ही सहज इंसान भी थे,उनसे मिलना एक विलक्षण आनंद की अनुभूति प्रदान करता था।प्रेम और मानवता के गीतों के अमर गायक गीतों के राजकुमार नीरज जी को उन्ही के गीत की एक पंक्ति से अपने भाव सुमन अर्पित कर रहा हूँ–

  “आज भले जग कहले कुछ भी,पर कल विश्व कहेगा सारा।

नीरज से पहले गीतों में सब कुछ था पर प्यार नहीं था।”

 

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6-सत्या शर्मा ‘ कीर्ति ‘

कवि और गीतकार गोपालदास नीरज भी हिंदी कविता की अनन्त यात्रा करते हुए सूक्ष्म शरीर में विलीन हो गए और हम सभी हतप्रभ खड़े देखते रहे गीतों के कारवां के गुजर जाने को । ऐसे में याद आती रही  उनकी ही एक कविता — ” अभी न जाओ प्राण , प्राण में प्यास शेष है ।” नीरज हमेशा मानते रहे कविता को अगर गाई जाए तभी वो चिरस्थायी  हो सकती है, इसलिए वे कवि सम्मेलनों में छंद , दोहे ,गीत बनके उतरते रहे जनमानस की  रूहों में ।उनके गीतों की सार्थकता ही थी कि हर सम्मेलन में उन्हें मंच पर अंत में बुलाया जाता था और श्रोता बैठे रहते थे उन्हें सुनने को । तभी तो राष्ट्रकवि दिनकर ने उन्हें  हिंदी की  वीणा कहा ।हिंदी और हिंदी कविता के एक ऐसे पथिक जो आज अपनी मंजिल पर चले गए हमें छोड़ कर किन्तु उनकी ही  शायरी के शब्द बार – बार जेहन में तैर रही है — ” लगेगी आपको सदियां हमें भुलाने में ।

 

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7-डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

शोखी’ वाले ‘कारवाँ’ गुजरेंगे सौ बार
कौन सुनाए गीत अब, उजले, पानीदार ….उन्होंने कहा था – ‘काल का पहिया घूमे रे भइया !’
काल का पहिया घूम गया और संग ले गया मानवता की जोत जलाते ,‘आदमी को आदमी बनाने के लिए,
स्याही नहीं आँखों वाला पानी चाहिए’ , ‘जलाओ दिए पर…’ , ‘ऐ भाई जरा देख के चलो’ , ‘शोखियों में…’ जैसे कालजयी गीतों के अमर गायक को । पद्मश्री, पद्मभूषण ,यश भारती, दिनकर के शब्दों में- ‘हिन्दी की वीणा’ ‘नीरज’ जी का महाप्रयाण साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति है।
विनम्र श्रद्धाञ्जलि ??

 

 

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8-नीरजएक भावांजलि

प्रियंका गुप्ता

 इटावा में जन्म और ज़िंदगी के बाकी सफ़र में दिल्ली, मुंबई और अलीगढ़ में कुछ समय बिताने वाले स्वर्गीय गोपालदास नीरज का मेरे शहर कानपुर से कुछ ख़ास ही लगाव रहा, तभी तो उन्होंने कुछ पंक्तियाँ ही कानपुर की यादों को समर्पित करते हुए कह दिया थाकानपुर! आह! आज याद तेरी आई फिर

तिरानबे बरस की उम्र और उस पर बीमार शरीरसच्चाई कहती है उन्हें जाना ही था किसी दिन, पर मन कहता है, काश ! वक़्त की किताब से वो पन्ना ही फट जाता, जहाँ लोगों के दिलों में बरसोंबरस राज करने वाले इस कवि का जाना लिखा था | खुद कोतपभ्रष्ट योगीकहने वाले नीरज सच में योगी ही रहे | फिल्मों में ढेरों शानदार और लोकप्रिय गीत देने वाले इस योगी को मायानगरी कभी लुभा पाई और वे वापस अलीगढ़ लौट आएऔर एक बार फिर आम जन को उनको साक्षात देखनेसुनने का सौभाग्य मिलने लगा |

सच कहूँ, तो उनके बारे में कुछ कहनासूरज को चिराग़ दिखानेजैसा ही महसूस हो रहा है…| हमारे देश में कवि और शायर तो बहुत हुए और भविष्य में भी काव्याकाश पर ढेरों सितारे झिलमिलाएंगे, पर उन लाखों तारों के बीच में भी अपनी चमक बिखेरने वाले ध्रुवतारे नीरज शायद अकेले ही रहेंगे |बहुत याद आएँगे नीरजआखिर उन्होंने ही कहा भी तो है-‘इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में। पीने का सलीका पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में’॥

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9- गोपालदास नीरज ~एक श्रद्धांजलि-  -अनिता ललित

नीरज जी के साथ में ललित कुमार जी और अनिता ललित

“ख़ुशी जिसने खोजी, वो तन ले के लौटा,/हँसी जिसने खोजी, चमन ले के लौटा,मगर प्यार को खोजने जो चला वो/न तन ले के लौटा, न मन ले के लौटा …”

हर तरफ़ शोर है –“कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे …” एक महान कवि, गीतकार, हमारे देश के गौरव, पद्मश्री एवं पद्मविभूषण की उपाधियों से अलंकृत परम् आदरणीय श्री गोपालदास नीरज जी ने 19 जुलाई 2018 को सदा के लिए इस संसार को अलविदा कह दिया! शब्द गुम हैं, आँखें नम हैं! कभी न भरने वाला एक ख़ालीपन दिल को कचोट रहा है!

“कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे…” यह गीत मैं बचपन से रेडियो पर, ग्रामोफ़ोन तथा अपने पापा के मुँह से सुनती रही! उस वक़्त न इस गीत के बोल समझ में आते थे, न ही अर्थ! थोड़े बड़े होने पर पापा से क़िस्सों में नाम भी सुना –कवि नीरज जी! पापा बताया करते थे कि कानपुर में, अपने मोहल्ले में एक छोटे से कमरे में नीरज जी अपनी महफ़िल जमाया करते थे और मेरे पापा भी उनको सुना करते थे! तभी से वे उनके बहुत बड़े प्रशंसक बन गए थे! नीरज जी के गीतों में प्रेम की गहरी कसक थी, दर्द था, जो उनके गीतों में साफ़ झलकता है, जो बरबस ही सुनने/पढने वाले से एक रिश्ता क़ायम कर लेता है –‘सुबह न आई..’; ‘वो हम न थे, वो तुम न थे..’; ‘दिल आज शायर है..’; ‘रंगीला रे..’; ‘शोख़ियों में घोला जाए…’; आदि अनेक गीत हैं जो उनकी लेखनी से रसधार की मानिंद छलके और अमर हो गए! यही कारण है कि उनके प्रशंसकों में आज की पीढ़ी भी शामिल है!

क़रीब दो वर्ष पहले 24 जुलाई 2016 में, मुझे इन महान हस्ती से लखनऊ में उनके घर पर मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ! वे कुछ अस्वस्थ थे, फिर भी उहोने उठने की कोशिश की मगर उठ नहीं पाए थे! उन्होंने लेटे-लेटे ही मुझसे कुछ बातें कीं ! मेरे पापा से भी फ़ोन पर बात की और पुराने दिनों की यादें ताज़ा की! मेरे पापा ने उन्हें बताया कि वो आज भी उनके उतने ही बड़े प्रशंसक हैं और सोते वक़्त उनके गीत व कविताएँ यू-ट्यूब पर सुनते हैं!

मैंने अपना प्रथम काव्य-संग्रह तथा हाइकु-संग्रह उन्हें भेंट किया! उन्होंने बहुत रुचि लेकर दोनों संग्रह हाथ में लिये और देखे! हाइकु भी उन्होंने बड़े चाव से पढ़े! फिर मुझसे मेरी कुछ क्षणिकाएँ, हाइकु एवं कुण्डलियाँ सुनीं एवं प्रशंसा भी की! कुछ अपनी पंक्तियाँ भी सुनाईं! सुनकर दिल भाव-विभोर हो उठा था! ये वे अनमोल पल थे, जो सदैव मेरे जीवन की पूँजी रहेंगे!

अभी नौ महीने  पहले मेरे पापा का निधन हो गया और अब नीरज जी का! यदि पापा आज हमारे बीच होते, तो वे बहुत-बहुत दुखी होते! ईश्वर इन दोनों महान आत्माओं को अपने सानिध्य में ले, वे दोनों उस लोक को भी समृद्ध करें एवं अपने आशीष की वर्षा करते रहें -यही मेरी प्रार्थना है!

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10-लिखना तुम्हें साँसे देगा

भावना सक्सैना

“लिखना तुम्हें साँसे देगा” – नीरज (एक छोटी सी मुलाकात)
लगभग 26-27 वर्ष पहले जब मैं मैत्रेयी कॉलेज में अंग्रेजी ऑनर्स पाठ्यक्रम की द्वितीय वर्ष की छात्रा थी तब एक दिन बस में  मिले थे नीरज। एक सीट पर सफेद कुर्ते पाजामे में कुछ उम्र दराज से व्यक्ति को शांत अकेले बैठे देखा तो हैरत सी हुई। संयोग से और कोई सीट खाली ना होने के कारण मुझे उन्हीं के साथ बैठना पड़ा।   उन्होंने सहज ही पूछा,  यह बस कितनी देर में चलेगी।  मैंने उत्तर दिया ‘बस अभी भर गई है, तो जल्दी ही चल पड़ेगी’।  कुछ और सामान्य से उनके प्रश्न,  यहां पढ़ती हो?, कौन से कोर्स में? कौन सा साल? आदि।बता दिया, और फिर मैंने भी पूछ लिया आप यहां कैसे? तो वह बोले तुम्हारी प्रिंसिपल से मिलने आया था, ‘ओह! संक्षिप्त सा उत्तर देकर मैं चुप हो गई, अब प्रिंसिपल के परिचित से छात्र क्या कहे! ज़रा रुककर वह बोले – “मेरा नाम नीरज है, गीत लिखता हूं।

मैं हतप्रभ थी, नीरज!!!  मैं चेहरे से वाकिफ नहीं थी क्योंकि उस जमाने में चित्रहार में फिल्म और गीतकार के नाम दिए जाते थे सो नाम से तो मैं भली भांति परिचित थी।  यकीन नहीं हो रहा था कि जिनके गीत हम बचपन से सुनते पसंद करते रहे थे, मेरे सामने थे,  कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वह इस तरह रास्ते में मिल जाएंगे। हम यही सोचते थे कि जिस तरह हीरो हीरोइन और फिल्मों के अन्य कलाकार बड़े बड़े व्यक्तित्व हुआ करते हैं गाड़ियों में घूमते हैं उसी प्रकार गीतकार भी होते होंगे। मैंने कहा मुझे पके गीत पसंद हैं। वह मुस्कुराए और मेरा अगला प्रश्न सुनकर हंस पड़े थे क्योंकि मैं उनसे पूछ बैठी थी – ‘आप नीरज हैं तो आप बस में सफर क्यों कर रहे हैं?’ मुस्कुराकर उन्होंने कहा था‘क्योंकि बसें सफर करने के लिए होती हैं’।  हैरानी व संकोच में ज्यादा कुछ कह नहीं पाई फिर भी बैग से रजिस्टर निकालकर उनके हस्ताक्षर लिए थे।हस्ताक्षर करते हुए उन्होंने कहा था, मेरे हस्ताक्षर लेकर क्या करोगी? मैं कोई बड़ा आदमी थोड़े ना हूँ।

फिर भी उन्होंने शायद मेरा दिल रखने को शुभकामनाओं सहित लिखकर हस्ताक्षर किए थे। वह हस्ताक्षर भी उस घर से इस घर के सफर में कहीं गुम हो गए।  बहुत संकोच से मैंने उन्हें बताया मैं भी थोड़ा-थोड़ा लिखती हूं.. उन्होंने कहा था लिखते रहना, लिखना कभी छोड़ना मत, ये तुम्हें साँसे देगा… 19 की वय में उस समय शायद यह समझ नहीं या था, आज आता है।  ये वाक्या न जाने कितनी बार लिखने की सोची पर लिखा नहीं… कल उनके जाने के समाचार से अब तक मन में  गूँज रहैं हैं शब्द, ये तुम्हें साँसें देगा…
लेखन की राह पर चलने को प्रेरित करने के लिए में सदा उनकी आभारी रहूंगी।
सच नीरज लिखने ने ही शायद आपको साँसें दी और हमें ऐसे गीत जो हमारी साँसों में बस गए। यही होता है अमर हो जाना। गीतकार तुम्हें नमन है!

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