हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

अनिता मण्डा की कविताएँ - अनिता मण्डा

1.मोह

उनके सपनों में आते हैं जंगल
सपने में बहती है एक शीतल नदी
सपने में महकता है महुआ
बरसों की तपस्या से साधा गया ज्ञान जड़ी बूटियों का
भूल जाना चाहते हैं वो दुःस्वप्न की तरह
अभ्यासरत हैं शहरों का- सा अजनबीपन सीखने में
फिर भी सुनना चाहते हैं परिंदों की चहक
हिरणों की सी चपल चौकस निगाहें
अनजाने ढूँढती रहती हैं कस्तूरी
एक नदी हृदय से निकलती है
आँखों तक आते- आते समुद्र बन जाती है

जंगलों से विस्थापित किए गए आदिवासी
भूल नहीं पाए हैं जंगल का मोह।

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2.मुक्ति

दम घुट रहा है ईश्वर का 
बंद दरवाजों के पीछे
ऊब चुका है कृत्रिम भक्ति से
कान फोड़ रही हैं
भजन -अजानों की आवाज़ें
इनमें दबकर रह गए हैं उसके स्वर
पीड़ा में है ईश्वर
भयंकर पीड़ा में

किसके साथ करे अपना मन हल्का
कि सभी जाते हैं उसके पास
भरे हुए प्रार्थनाओं से
अपने मौन में प्रार्थनारत है ईश्वर
मुक्ति की कामना से
नहीं सहन कर पा रही ईश्वर की आत्मा
अब ओर दाग़
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3.-यातना

ऊँचाई को लिखा हिमशिखरों में
गहराई को महासागर
मीठा लिखने को नदी बनाई
प्रेम को लिखा
बारिश की लिपि में
स्वाद को लिखा नमक

अनछुए स्पर्शों को लिखा
ख़ुशबू की शैली में
ओ मेरे कूजागर !
कोई सीमा तो लिखी होती
स्त्री-देह के लिए यातना लिखते हुए।
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4.फल

पहाड़ों पर बनाये देवताओं के मन्दिर
मंदिरों के लिए रास्ते
रास्तों पर सड़कें
सडक़ों के लिए काटे पहाड़
हटाए रस्ते से पेड़
अब नंगी सड़कों के किनारे
ढूँढ़ते हैं छाँव
माँगते हैं मनौती
देवताओं से वर्षा की
जबकि सबसे बड़े देवता तो हैं वृक्ष
सिर्फ वही देते है दृश्य फल.
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5.आषाढ़

बादल व्यस्त हैं चित्रावली बदलने में
भरे आषाढ़ में अम्बर की आँखें हो रही हैं सावन
नदी ने ढका है बादलों से अपना बदन
सतरंगी ओढ़नी सूख रही है आकाश के आँगन

कच्चे गर्भ की उबकाइयों से उकताई धरती
उमस से बेहाल करवटें बदलती 
चिड़िया एक-एक कर तिनके जमा करती

मुग्ध मोर पंख छितराये नाच रहे हैं
बादलों ने छेड़ा है मृदंग-अभ्यास
पेड़ झूमते हैं हवा के इशारे पर

स्मृतियों की हरियाली पगडंडी पर 
ठहरे हुए पल
करना चाहते हैं साथ क़दमताल
भीगा हुआ मन
उतार फेंकना चाहता है
बिरहा का पैरहन
कि बाँच लो मन
आषाढ़ की आँखें हैं
सावन-सावन
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