हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

कुछ दोहे - डॉ.गिरिराजशरण अग्रवाल

1

मित्र वही, अपना वही, दुख में रहता साथ।

विपदा के पल में कभी, नहीं छोड़ता हाथ।

2

तुम मेरी तस्वीर हो, तुम मेरी पहचान।

तुम कविता हो प्रीत की, तुम मेरे अरमान।

 

3

जंग लड़ रहा धर्म की, यह कैसा इंसान।

इंसानों के खून से, सराबोर शैतान।

4

आतंकी के धर्म को खोज रहे हैं लोग।

शब्दों के औजार से, काट रहे हैं रोग।

5

बहस हुई, चर्चा हुई, हुई बड़ी तकरार।

आखिर तक निकला नहीं, मुद्दों का हल यार।

6

बोते हैं जो जहर की, फसल प्रेम के बीच।

निगल जाएगी एक दिन, उन्हें जहर की कीच।

7

पत्थर छोटी जिन्दगी, पर पहाड़-से द्वंद्व।

बहती नद-सी साँस में, सौ-सौ हैं छलछंद।

8

राजनीति के बाग में, कीकर उगे हजार।

कोई तो आए, करे, इनका उपसंहार।

9

आली तू माली कुशल, नहीं फूल को भूल।

संबंधों के बाग में ,हर सुगंध अनुकूल।

10

संबंधों के खेत में मत तू कीकर रोप।

प्यार भरे संबंध में ,उचित नहीं आरोप।

11

दंभ-द्वेष की भीत पर, खड़ा हुआ इंसान।

जितना भी ऊँचा चढ़े ,होता है लघुमान।

12

धर्म नहीं आतंक का दोहराते हर रोज

फिर भी हम आतंक को, रहे धर्म में खोज

13

कितने बेमानी हुए धर्मों के संदेश।

धर्म  तुम्हारा नाम ले ,बँट जाते हैं देश।

14

चितन और विचार के, मिटा रहे हम कोश।

जोश धर्म का भर रहे, और खो रहे होश।

15

संकल्पों का रथ बना, तुरग बोध के जोड़।

साहस को कर सारथी , घनी निराशा तोड़।

-०-डॉ॰ गिरिराजशरण अग्रवाल,बी-203, पार्क व्यू सिटी-2, सोहना रोड,गुरुग्राम ( हरियाणा)

7838090732