हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

ज्योति मोदी की कविताएँ - ज्योति मोदी

1-जब अश्लील होती है दुनिया

छोटे छोटे जंगलों और पहाड़ों जैसी कविताएँ हैं
तुम सर झुकाए लिखते जाते हो
कहीं मेरी ही पीठ पर

मैं जरा भी नहीं डोलती
साँस थामें रहती हूँ

और तभी होती है बारिश
और तभी बताते हैं सब बेचैन समंदर
यही वह फन है, जिससे हम प्यास बुझाते हैं

जब अश्लील होती है दुनिया
ज्वार अपूर्ण गीत गाता है
तुम धीमे पुकारते हो आने वाले महीने से
पुकारते जाते हो

तभी बताता है लोर्का
ऐसे ही तो डूबती है नाव
ऐसे ही डूबते हैं तैराक
यही वह तरीका है ,

जिसमें कविता पढ़ते होंठो को

चुम्बन जरा भी नहीं दुखते हैं ।

उत्सुक फलों और फूलों जैसी है

मेरी अलस गुनगुनाहट
अनमनी धूप में सूखती है
भीगती रहती है विश्राम में

तुम एक लट की तरह उड़ान लेते हो
पर मेरे ही गिर्द

तभी एक पुरातत्त्वविद् बोलता है
गुनाह जीवित हैं
कठिन प्रार्थनाओं की तरह
फ़तवों कि तरह जीवित हैं बर्बर सभ्यता
सबसे सरल हुनर है वही
जब युद्ध में हो सिपाही तुम सर झुकाकर कविता लिखो
जैसे लिखते हो अभिसार के पहले।

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2-कादम्बिनी

 

 

कादम्बिनी

तुम्हारे सामने ही तो टूट रहे थे सीखचे
तुम देखती थी काँप रहे थे पक्षियों के रव
क्या नहीं कहा किसी ने तुम्हें
मुखर्जी लेन के अंतिम सिरे पर

उजड़ गया है पुराने हरे रंग का घर
वहाँ शव जैसे रहता है अब एक लेखक

उससे मिलने मत जाना
वह फिर हटाएगा किताबें , पन्ने , कपड़े
खोजेगा जगह तुम्हें बैठाने, खोजेगा शब्द जहाँ से वह जीवित दिखे

तुमने किसी के लिए कविता लिखी थी न कादम्बिनी
वह बसों में भटकती है
ट्रामों में फिरती है
उसके करीब जाओ तो ऐसे गमकती है

मानों अभी आ‌ई है गर्भ से निकल कर

भूल जाओ  कि तुम याद कर लोगी
कलकत्ते की सीढ़ियाँ
एक पर बंकिमचंद्र ने डाल रखी है चादर

एक को ढक रखा है शरतचंद्र ने हथेली से
बस घंटाघर ही है जो याद रखता है
अभी लोग आएँगे गंगा घाट पर अभी दाह का समय है

कादम्बिनी
तुम्हारा ही निषिद्ध आलोक है ,

जो बरसों बाद दिखता है सूने बरामदे में
वहाँ एक गाछ है मात्र, फूलता है बिना जल के
एक गाड़ी है जो जर्जर हो रही है बिना गाड़ीवान के
एक विश्वविद्यालय है ,जहाँ छात्र सीखते हैं बांग्ला
एक संगीत है ,जो अपने नाम कर लिया है रवि ठाकुर ने
बस एक ही खिड़की है ,जो देखती है
मारा जा चुका है तुम्हारा ताड़ -सा दुर्बल कवि
कला संकाय भरा है मोटे ठिगने कवियों से

सोचा है कादम्बिनी
जबसे टूट गया है लैम्प पोस्ट
घना अंधकार होता है मुखर्जी लेन के निकट

ज्ञात नहीं होता कहाँ द्वार हैं कहाँ दीवार
कहाँ क्रांति है ,कहाँ दंगे
कौन पढ़ेगा कविता विक्षिप्त हो के

सोचा है कादम्बिनी –
तब कहाँ रहोगी तुम
ऐसे विराट कलकत्ते में !

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3-इतिहास नहीं 

आधी रह जाती है नदी तुम्हारी हाड़ी में काकुली
तब पहुँचती है घर
तब तक पूरी पृथ्वी हो गई तुम्हारी देह से आती है मदिर गंध
सिर्फ मदमत्त निमाई नहीं देखता यह
जो पत्तल भर भात को उठा लेता है कांसे के बर्तन
और भय नहीं खाता हड्डी चिटकने से
क्योंकि भय नहीं खाता कर्फ्यू में
पार्टी का आदमी है
खुले आम तोड़ता है शराब की बोतलें

पूरी बस्ती देखती है
तुम वोट देने नहीं जाती
राशन दुकानों से लौट आई खाली हाथ
तुम्हारे झंडे पर इंकलाब का हरा रंग नहीं
ताज़ा गर्भपात का रक्त है

आधी रह जाती नदी
आधी रह जाती काया
आधी आधी छाया ब्रह्माण्ड की

बहुत दिन हुए
तीस्ता सोचती है – क्यों भेजती हो तुम
13 बरस की मामोई को हाड़ी दे के!
बीहड़ रास्ते पर फूल तोड़ती है
गुनगुनाती है वह, किन्तु नहीं जानती
सर पर रखा पानी पृथ्वी बना देता है स्त्री को
नभ में सुदूर रहते हैं देव
गाड़ियों से आने वाले , शव पर फूल और पैसे रखने वाले
धूल उड़ाते हैं , अन्धकार करते हैं
हैंडपम्प के लिए कागज़ और बिजली के लिए आश्वासन देते हैं

आधी रह जाती है साँस तुम्हारी छाती में
जब खाँसती हो , जब खाँसती हो काकुली तो जानती हो
सर पर रखा पानी पृथ्वी बना देता है स्त्री को
और मदन मंडल भी निमिष भर को लोहारी छोड़ सोचता है
इतिहास दोहरा ले।

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कोलकाता निवासी ज्योति शोभा, झारखण्ड दुमका से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक हैं। सजग पाठिका एव सदैव साहित्य सृजन में उन्मुख ज्योति , अंग्रेजी , हिंदी और उर्दू भाषाओं की जानकार हैं। इनकी रचनाओं में परम्परागत लेखन से इतर लोकाचार के नवीन रंग और विन्यास की अलग कल्पना है।  ‘बिखरे किस्से’ संग्रह के अतिरिक्त इनकी कई कविताएँ राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं।  प्रेम, प्रकृति , विरह के भाव की परिचायक हैं इनकी लेखनी।  [email protected]