हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

दीपावली - नवांकुर

1-राह मेरे राम की

      इरशाद

 

आज फिर मेरे राम की वो शाम आएगी

     फिर आंगन में खुशियों की बहार आएगी

 हर बुराई को दिल से मिटा देने वाली

     मुहब्बत की ऐसी वो शाम आएगी

 खोल देना दरवाजे आज लक्ष्मी आएगी

     हर घर में मुहब्बत का पैगाम लाएगी

 नन्ही-सी गुड़िया जब पटाखे चलाएगी

     हर दरवाजे़ से रोशन बहार आएगी

 राह तक रही है दरवाजे़ पे बैठकर

     वहीं से राम-सीता सवार आएगी

 मेरे राम को आँचल में बसा लेने वाली  

 कौशल्या हर आँगन में गीत गाएगी ।

 

 बुलाकर गले से मेरे राम को लगाएगी

     हाय चौदह बरस एक पल में वो भूल जाएगी

 हर किसी के होंठों पर मुस्कान आएगी

     जब रोकर मेरे राम की आरती गाएगी

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2-माटी के दीपक

विपन कुमार

 

उठो अब चलो भी,

कोने में पड़े हो।

फिर हमें याद फरमाया है।

शायद खबर नहीं तुम्हें,

दिवाली का त्योहार आया है।

 हमें जलाकर अँधेरा मिटाना होगा,

आज फिर घरों को सजाना होगा।

तुम भी चमकोगे, मैं भी जगूँगा,

जगमग का समय फिर एक बार आया है।

दिवाली का त्योहार आया है।

 *हम माटी के दीपक, माटी में मिलेंगे,

इन पत्थर दिलों में टिक न सकेंगे।

इन्हें दीया और बाती भाते नहीं हैं,

ये दीपों की माला बनाते नहीं हैं।

    पूछते हो कोने में क्यों पड़ा हूँ,

   जानता हूँ दिवाली का त्योहार आया है।

   खुशी के अवसर पे मायूस होने का

मौका फिर एक बार आया।

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 3-ऐसा दीपक

  राहुल लोहट

 

आज जगमागी -सी शाम

कितनी निराली है,

झिलमिल सजी दीयों से 

ये दीवाली है,

हर हथेली पर है थाल

रोशनी से भरा,

एक-एक दीप ने

हर एक आँगन के

अंधकार को हरा,

पंक्ति मोमबत्तियों की

कुओं की मेढ़ पर

मनमोहक,मनोहर

आँखे खींच रही है अपनी ओर,

खुशियां-ही-खुशियां

बिखरी है चहूँ ओर,

मगर सुनो,

ऐसा दीप नहीं जलाना हमें

सिर्फ त्यौहार के दिन ही

ये देश नहीं सजाना हमें

सिर्फ त्यौहार समझ

इसे नहीं मनाना हमें

हर रोज अपने दिलों से,मन से

मनाना है,सजाना है वतन अपना,

जिसका उजाला एक रात के बाद

सिमटने को मजबूर ना हो,

जिसकी चमक,रोशनी

कभी उससे दूर ना हो,

हमें ऐसा दीपक बनाना है वतन अपना,

हमें ऐसा दीपक बनाना है वतन अपना।।

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