हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

मेरी पसंद के हाइकु - सम्पादक

चयन -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 

1-डॉ,भागवत शरण अग्रवाल

1-तुम्हारे बिना /दीवारें हैं, छत है/घर कहाँ है

2-वर्षा की रात/बतियाते मेंढक/चाय पकौड़ी।

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2-डॉ.सुधा गुप्ता

1-लुक-छिपके /चार-दीवारी फाँद/आ कूदा चाँद।

2-लाल गुलाल/ पूरी देह पे लगा/हँसे पलाश ।

3-नाज़ुक कली/ आग की लपटों में/धोखे से जली ।

4-नीड़ बेकार/शावक उड़ गए/पंख पसार ।

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3-डॉ. भावना  कुँअर

1-लेटी थी धूप / सागर तट पर  /प्यास बुझाने ।

2-परदेस में /जब होली मनाई/तू याद आई।

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4 -डॉ- हरदीप कौर संधु

१-पत्र जो मिला /लगा  बहुत पास/ दूर का गाँव

२-भूल न पाया / जब-जब साँस ली / तू याद आया

3-ऊँचे मकान / रेशमी हैं  परदे / उदास लोग .

5-कमला  निखुर्पा

1-आई हिचकी /अभी -अभी  भाई   ने / ज्यों चोटी खींची .

2-भरी -भरी थी /बदरा की अँखियाँ/बही नदियाँ ।

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6-रचना श्रीवास्तव

१- बेटे का कोट / रोज़ धूप दिखाती  माँ/ प्रतीक्षा  में माँ .

२-आँसू से लिखी / वो चिट्ठी जब खोली / भीगी हथेली।

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7-डॉ जेन्नी शबनम

1.प्रेम बंधन / न रस्सी न साँकल / पर अटूट।

२-प्रीत रुलाए /मन को भरमाए/पर टूटे न।

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8-डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा (ओस नहाई धूप)

1-रजनी बाला / कहाँ खोया है बाला / हँसिया वाला ।

2-पत्ता जो गिरा / मुस्कुरा कर कहे / फिर आऊँगा ।

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9-डॉ.कुँवर दिनेश सिंह

1-मेघों का नाद / हृदय को बींधती / प्रिय की याद।

2-मन अधीर / दर-दर भटके / मौन समीर।

10-डॉ.कविता  भट्ट

1-जब भी रोया /विकल मन मेरा /तुमको पाया।

2-तुम प्रणव / मैं श्वासों की लय हूँ /तुम्हें ही जपूँ ।

3-मैं हूँ पाँखुरी /तुम मेरा हो रंग/सदैव संग 1

4-पाहन हूँ मैं /तुम हीरा कहते /प्रेम तुम्हारा।

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11-भावना सक्सेना

1- झील-दर्पन / देख रही घटाएँ / केश फैलाएँ।

2- मन की मीत / गठरी यादों भरी / भींच सहेजूँ।

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12-अनिता ललित

1-माँ सिसकती / आँगन हुड़कता, / हो बेटी विदा।

2-माँ तेरे आँसू / तूफानों में हैं सोते / ख़ुशी में ‘सोते’ ।

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13-ज्योत्स्ना प्रदीप

1-सहेजे मैने / तेरे दिये वह काँटे / कभी ना बाँटे।

2-जीवन बीता / वह कभी बनी राधा / तो कभी सीता।

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14-प्रियंका गुप्ता

प्रेम की नदी / सामने ही थी बही / प्यासी ही रही।

प्रेम की नदी / पार किया तो जाना / आग से भरी।

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15-शशि पाधा

1-अक्षर झरे  / कल्पना -सरसि से  /गागर भरे |

2-क्यों दोहराऊँ  /इस  व्यथा -कथा को /चुप पी जाऊँ |

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16-सुदर्शन रत्नाकर

सर्दी की रात / लोग सोएँ भीतर / चाँद अकेला।

ज़रा सुनो तो / कराहते पर्वत / कटे हैं वन।

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