हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

वतन की याद में - इन्दरजीत 'निर्दोष'

बिछड़े ऐ वतन तेरी, इक झलक को हम तरसें 

झूमती हवाओं की, इक झनक को हम तरसें 

सुबहो-शाम की लाली, आसमाँ की चादर पर 

और ज़मीं पे पायल की, इक ख़नक को हम तरसें 

गाँव की हसीं गलियाँ, खेतों- खेतों हरियाली 

लहलहाती फ़सलों की, हर लचक को हम तरसें 

पेड़ों की क़तारों से, ढाबों की बहारों से 

रोज़ो-शब सजी तेरी, हर सड़क को हम तरसें 

पानी के छिड़कने से, धूल का वो जम जाना 

धीमी– धीमी फिर उठती, हुई महक को हम तरसें 

गाँव की हसीनों को, झूला  झुलाते हुए 

शाख़ -शाख़ झूलों की, हर लपक को हम तरसें 

बादलों की वो बूँदें, बोरियों के वो छाते 

सावनों में कोयल की, इक चहक को हम तरसें 

पीपलों के साये में, पनघटों पे वो जमघट 

बादलों में बिजली की, हर चमक को हम तरसें 

ढोल पर नगाड़ों पर, तबलों की तालों पर 

नाचते जवानों की, हर धमक को हम तरसें 

रौनकें वो मेलों की, दंगलों के वो मंज़र 

चूड़ियो। की छन- छन की, इक छनक को हम तरसें 

मोरों और हिरणों से, लेके मस्तियाँ सारी 

नाचती हसीनों की, हर थिरक को हम तरसें 

चाहतें बज़ुर्गों की, भाई और बहनों की 

माँ की गोद में पाई, हर थपक को हम तरसें 

क्या बताएं ऐ ‘निर्दोष’ उन की मस्त आँखों पर 

झपझपाती पलकों की, हर झपक को हम तरसें।