हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

राजेन्द्र वर्मा के गीत - राजेन्द्र वर्मा

1-निर्विकार बैठे

नये-नये राजे-महराजे

            घूम रहे ऐंठे ।

लोकतन्त्र के अभिजन हैं ये

देवों से भी पावन हैं ये

सेवक कहलाते-कहलाते

            स्वामी बन बैठे ।

लाज-शरम पी गए घोलकर

आत्मा बेची तोल-तोलकर

लाख-करोड़ नहीं कुछ इनको,

            अरबों में पैठे ।

नयी सदी के नायक हैं ये

छद्मराग के गायक हैं ये

लोक जले तो जले,  किन्तु ये

            निर्विकार बैठे ।

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2-फिर बयान

फिर बयान:

हम तुम्हारे साथ ।

साथ उनका चाहते

हरगिज़ नहीं हम,

किन्तु वे सिर पर खड़े

साधे हुए दम,

ताज का सपना

हुआ साकार ही था,

काट कर वे कर हमारे

दे रहे हैं

फिर बयान:

हम तुम्हारे हाथ ।

हर मुसीबत में

वही बस, एक ईश्वर,

किन्तु वह असहाय

निस्पृह देखता भर,

पीढियां बदलीं,

निराश्रित आज भी हम,

मीडिया को साधकर वे

दे रहे हैं

फिर बयान:

हम तुम्हारे  नाथ ।  

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3-विलग साये

बँट गयी दुनिया मगर,

हम कुछ न कर पाए!

घर बँटा दीवार खिंचकर

बँट गये खपरैल-छप्पर

मेड़ छाती ठोंक निकली

बाग़ में, खेतों के भीतर

हम किसी भी एक के

हिस्से नहीं आए !

कुछ इधर हैं, कुछ उधर हैं

आत्म से भी बेखबर हैं

बात कैसी भी कहें हम

छिड़ रहा जैसे समर है

बह गयी कैसी हवा-

ख़ुद से विलग साये !

बात का बनता बतंगड़

मौन ही रोके है गड़बड़

होंठ हिलने को हुए, बस-

तानता है वक़्त थप्पड़

मौन मन कब तक भला

एकांत दुलराए ?

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4-आँसुओं का कौन ग्राहक

आँसुओं का कौन है ग्राहक यहाँ,

फिर उन्हें हम

क्यों उतारें हाट में?

हम प्रदर्शन हीनता का क्यों करें?

आप अपनी दृष्टि में हम क्यों गिरें?

हर कहीं आश्रय न मिलता पीर को

फिर उसे हम छोड़ दें क्यों बाट में?

प्रेम-पथ पर जब चला कोई मनुज

देवगण भी हो गये जैसे दनुज

भाग्यशाली हम कि भीगे हैं नयन

नीर जन्मा है

कभी क्या काठ में?

कुछ हलाहल हम पियें, कुछ तुम पियो

चार पल हम भी जियें, तुम भी जियो

क्या समय की यह न हमसे माँग है

डाल दें लंगर कहीं

हम घाट में!

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5-आसमान अपना

सूनी आँखों ने देखा है

एक और सपना,

            धरती इनकी-उनकी,

            लेकिन आसमान अपना ।

एक हाथ सिरहाने लग

तकिया बन जाता है

और दूसरा सपनों के संग 

हाथ मिलाता है

            पौ फटते ही योगक्षेम का

            शुरू मंत्र जपना ।

एक दिवस बीते तो लगता,

एक बरस बीता

असमय ही मेरे जीवन का

अमृत-कलश रीता

            भरी दुपहरी देख रहा हूँ

            सूरज का कँपना ।

जीवन की यह अकथ कहानी

किसे सुनाऊँ मैं

जिसे सुनाने बैठूँ, उसको

सुना न पाऊँ मैं

            दुख को यथायोग्य देने को

            सीख रहा तपना ।।

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6-आज नहीं तो कल

समय बदलता है,

बदलेगा आज नहीं तो कल,

क्षमा और करुणा के सम्मुख

                        हारेगा ही छल !

माना अँधियारा जगता है

अपनों से भी डर लगता है

लेकिन तनिक सोच तो रे मन!

डूबा सूरज फिर उगता है

गहन निराशा में भी पलता

                        आशा का संबल ।           

सागर का विशाल तन-मन है

किन्तु नदी का अपना प्रण है

जीव-जन्तु को जीवन देकर

पूरा करती महामिलन है

आओ, हम तीरथ हो जाएँ

                        बनकर गंगाजल ।

कोई छोटा-बड़ा नहीं है

लेकिन मन में गाँठ कहीं है

बड़ा वही जो छोटा बनता

जहाँ समर्पण,  प्रेम वहीं है

प्रेम-भाव से मिल बैठेंगे,

                 निकलेगा कुछ हल ।।

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7-कैसा यह जीवन

कैसे बतलाऊँ,

            कैसा यह जीवन है !

मेरे ही घर दुख ने डेरा डाला है

धीरज स्वयं हुआ जाता मतवाला है

यद्यपि मुझको भी अमृत-पान करना था,

किन्तु अभी हाथों में विष का प्याला है

अधरों पर मुस्कान,

            हृदय में क्रन्दन है।

सुख क्या है? दुख की आँखों का सपना है

कहना मुश्किल, कौन यहाँ पर अपना है!

यद्यपि निपट अकेले ही रहना मुझको

किन्तु निकटता की ऊष्मा में तपना है

लोकरीति है या कि

            यही अपनापन है?

सुख-दुख के आगे यात्रा करनी होगी

अपनी क्या! जग की पीड़ा हरनी होगी

यद्यपि सागर-पार उतरना है मुझको

किन्तु हाथ मेरे टूटी तरणी होगी

विश्वासों के गाँव

            अभी भी अनबन है !

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