हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

तीन लघुकथाएँ - अनिता ललित

1-बदलती परिभाषा

पाँच वर्षीय मुन्ना खिलखिला कर हँस रहा था। उसे बहुत मज़ा आ रहा था। वह बार-बार गेंद को गेट के बाहर फ़ेंक दे रहा था और कमला बार-बार दौड़कर, बाहर जाकर गेंद उठाके, लाकर उसके हाथों में थमा दे रही थी। मुन्ना को तब तो बहुत ज़ोर की हँसी आती थी जब उसके गेंद फेंकने के बाद कमला दिखावे के लिए अपनी आवाज़ में परेशानी भरकर बोलती थी-

“ओहो! फिर फ़ेंक दी!”

तब वह हँस-हँसकर लोटपोट हो जाता था।

तभी मेमसाहब, यानी मुन्ना की मम्मी, दोनों हाथों में शॉपिंग बैग्स लिए गेट के अंदर दाख़िल हुईं। मुन्ना को इस तरह खिलखिलाते हुए देखकर वे उसपर निहाल हो उठीं और-

“ओ! मेरा राजा बेटा!”

कहकर उन्होंने उसे गोद में उठाकर गले से लगा लिया और उसे ढेर सारा प्यार किया। उसके बाद उन्होंने एक तेज़ और तिरछी नज़र कमला पर डाली, जो अपनी खीज को छिपाती, हाँफती हुई वहीं घुटने मोड़कर ज़मीन पर थोडा सुस्ताने बैठ गई थी! मेमसाहब ने उसकी पस्त हालत को नज़रंदाज़ करते हुए उससे कहा,”ध्यान रखना, मुन्ना रोए नहीं। ठीक से खिलाती रहना।”

यह कहकर वे घर के अंदर चली आईं! वहीं बरामदे में माता जी, यानी उनकी सासू माँ भी बैठी हुई थीं व दूर से अपने पोते को खेलते हुए स्नेह से देख रही थीं! मेमसाहब के आते ही उन्होंने उनको अपने पास बुलाया और संकोच-भरे स्वर में उनसे कहा–

“बहू! ज़रा कमला को समझा दो बेटा! एक तो ठंडी-ठंडी रोटियाँ खिलाती है, उसपर से अगर दोबारा सब्ज़ी या दाल मँगाओ तो गुस्से में बड़बड़ाती है! ऐसा लगता है, जैसे मैं कोई भिखारी हूँ!”

कहते-कहते बेबसी से सत्तर वर्षीया माताजी की आँखें भर आईं थीं!

मेमसाहब ने मुँह बिचकाते हुए जवाब दिया-“क्या माता जी! आप भी ज़रा-ज़रा-सी बात का रोना लेकर बैठ जाती हो! काम करने वाले मिलते कहाँ हैं आजकल! कमला भी इंसान है आख़िर, वह भी तो थक जाती होगी! आप उसको ज़्यादा टोका-टाकी मत किया करो! शुकर मनाओ कि बैठे-बैठे रोटी मिल जाती है वरना तो …”

बोलते-बोलते मेमसाहब अपने कमरे में चली गईं!

माताजी की नज़रें कुछ पलों तक जाती हुई अपनी बहू की पीठ पर टिकी रहीं, फिर ख़ालीपन लिए घूम कर, दौड़ती-हाँफती कमला पर आकर रुक गई!

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2-आकलन

श्री बख़्शी अभिवादन करने की मुद्रा में स्टाफ़रूम में घुसे। वहाँ बैठे दोनों अध्यापकों ने उनके अभिवादन का जवाब दिया और अपने काम में व्यस्त हो गए. श्री बख़्शी को इस विद्यालय में अध्यापक बनकर आए एक हफ़्ते के करीब हो रहा था। आवश्यकता से अधिक आत्मविश्वास, बड़बोलेपन और मुँहफट स्वभाव के होने के कारण समझदार लोग उनसे थोड़ा दूर ही रहने की कोशिश करते थे। चश्मे से झाँकती उनकी तीर जैसी नज़र हर चीज़ का एक्स-रे लेने को उत्सुक रहती थी। अचानक उनकी निगाह कोने पर पड़ी किसी चीज़ पर पड़ी। उन्होंने जाकर उसे उठाया तो वह एक सोने की अँगूठी थी। उन्होंने लपककर उसे उठाया और वहाँ बैठे अध्यापकों से पूछा कि वह अँगूठी उनकी है क्या! उन दोनों ने ‘ना’ में सिर हिला दिया। इसपर श्री बख़्शी बोले,

“अजी! शुकर कीजिए कि मैंने देख लिया वरना सफ़ाई कर्मचारी तो अब तक इसपर अपने हाथ साफ़ कर गया होता। हम्म्म…”

उस दिन श्री बख़्शी ने हर मिलने वाले को अपना यह कार्य बढ़ा-चढ़ा के बताया, इस वाक्य के साथ कि ‘अजी शुकर कीजिए कि मैंने देख लिया वरना सफ़ाई कर्मचारी तो अब तक इसपर अपने हाथ साफ़ कर गया होता। हम्म्म…’

अगले दिन जब वे सीना ताने स्टाफ़ रूम में प्रवेश करने लगे तो वहाँ एक लड़के को मेज़ का सामान का सामान ठीक करते हुए देखकर बोल पड़े,

“क्या बात है भाई? कौन हो तुम और क्या ढूँढ रहे हो?”

इसपर वह लड़का बोला,

“अपनी सोने की चेन खोज रहा हूँ, यहीं कहीं गिरी थी।”

इसपर बख़्शी जी बोले,

“अरे कहाँ! यहाँ तो केवल अँगूठी ही गिरी थी, जो मैंने कल लॉस्ट प्रॉपर्टीज़ में जमा करवा दी थी। शुकर करो मैंने देख लिया वरना…”

बीच में ही वह लड़का बोल पड़ा,

“नहीं-नहीं! चेन भी थी साथ में। आप कैसे कह रहे हैं?”

इस बात पर श्री बख़्शी को बहुत ज़ोर का ग़ुस्सा आया और वे बोले,

” तुम्हारा मतलब क्या है? क्या मैंने वह चेन चुरा ली?

लड़के ने बेधड़क होकर कहा,

“अब मुझे क्या पता सर!”

अब तो श्री बख़्शी का मुँह तमतमा उठा वे चिंघाड़ उठे,

“ख़बरदार! तुम समझते क्या हो अपनेआप को? तुम मुझे जानते भी हो?”

इसपर वह लड़का बोला,

“जी सर, यही तो मैं भी कहना चाहता हूँ!”

बख़्शी जी बोले,

“क्या मतलब?”

लड़के ने कहा,

“मतलब वही सर-जिस तरह मैं आपको नहीं जानता, उसी तरह आप भी मुझे कितना जानते हैं? मैं यहाँ का सफ़ाई कर्मचारी हूँ।”

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3-नीयत

“इतनी देर कर दी तुमने आज, मीना। अच्छा चलो, जल्दी से ये सेब काटकर विकी बाबा को दे दो। आज से उनके इम्तिहान शुरू हो रहे हैं। मैं तब तक जूस निकालती हूँ और हाँ! सेब का छिलका उतारकर देना।”

कहते हुए मेम साहब ने तिरछी नज़रों से मीना को देखा, तो उसके साथ उसके छह वर्षीय बेटे को देखकर अनमनी-सी होकर पूछ बैठी-“क्या हुआ? इसे क्यों साथ ले आई?”

इसपर मीना बोली,”मेम साहब कल इसको बहुत तेज़ बुखार था। कल से कुछ खाया भी नहीं। आज साथ आने की ज़िद पकड़ ली तो लाना पड़ा। नहीं तो हम भी काम पर नहीं आ पाते”-कहते हुए उसने सेब की प्लेट और चाक़ू सम्भाल लिया और अपने बेटे से बोली,”ए मुन्नू! जा! बईठ जा हुआँ जाके! और कौनो सितानी न करना, ठीक!”

सहमा-शरमाया हुआ-सा मुन्नू वहीँ एक कोने में बैठ गया और माँ को सेब काटते हुए देखने लगा। सेब को देखते हुए धीरे-धीरे उसकी आँखों में एक लालसा-सी उभरने लगी। खाली पेट अंदर से मचलने लगा और वह ललचाई निगाहों से माँ को देखते हुए अपने पपड़ी जमे होठों पर जीभ फिराने लगा। मीना ने उसके मन की बात भाँप ली और डर कर उसने सेब की प्लेट के सामने अपनी आड़ कर ली। कहीं उसका भूखा बच्चा उससे सेब माँग बैठा तो वह क्या करेगी! वह जल्दी-जल्दी सेब पर चाक़ू चलाने लगी।

उधर मेम साहब विकी बाबा के पीछे जूस का गिलास लिए फिर रहीं थीं और उसकी मनुहार किये जा रही थीं-“पी ले बेटा! देख तो कैसे सूखता चला जा रहा है! पी ले, इससे दिमाग़ और तेज़ चलेगा और इम्तिहान में अव्वल आएगा। तू देखना!”

मगर विकी बाबा अपनी ‘ना’ पर ही अड़े हुए थे-“कहा न मॉम! मुझे नहीं पीना अभी। वैसे ही बहुत खा लिया है। अब जी मिचलाने लगा है मेरा। बस करो! मुझे देर हो रही है!”

तभी साहब की रौबीली गूँजी-“क्यों नखरे दिखा रहे हो? शुकर मनाओ ये सब नसीब हो रहा है वरना तो…”

बात पूरी होने के पहले ही गुस्से में विकी बाबा ने जूस का गिलास लिया और गटागट एक साँस में पी गया। गिलास रखते ही उसे ज़ोर की हिचकी आई, वह बाथरूम की ओर भागा और अगले ही पल सारा जूस उलट दिया।

मेम साहब भी उसके पीछे दौड़ीं।

“ओहो! ये क्या हो गया!”-

कहकर उसकी पीठ सहलाने लगीं। चिढ़कर विकी बाबा बाहर आया और अपना बैग उठाकर घर से बाहर निकल गया।

मेम साहब को समझ ही नहीं आया कि वह क्या प्रतिक्रिया दें कि तभी उनकी नज़र मुन्नू पर पड़ी, जो पता नहीं कब यह सब शोर सुनकर आकर वहीं खड़ा हो गया था और कौतूहल भरी निगाहों से यह सारा तमाशा देखने लगा था।  उसकी नज़रों में एक अजीब-सी उत्सुकता भरी हुई थी। उसका बाल-मन और खाली अकड़ता हुआ पेट इस ‘खा लो!’ और ‘नहीं खाना!’ की खींचातानी को नहीं समझ पा रहा था।

उसे देखते ही मेम साहब गुस्से में उबल पड़ीं,”तू क्या कर रहा हैं यहाँ मेरे सिर पर? जा के बाहर बैठ न! हाँ नहीं तो! चले आते हैं जाने कहाँ-कहाँ से भुक्खड़, नीयत लगाने को। तभी तो मेरे बच्चे का खाया-पिया सब उलटी हो गया! हुँह!”

मुन्नू सहमकर बाहर जाकर दरवाज़े के पास देहरी पर बैठ गया जहाँ मीना ने सेब के छिलके छील कर रख दिए थे। उन्हें देखकर उसकी मासूम आँखों में चमक आ गई. उसने एक पल को इधर-उधर देखा और फिर धीरे से एक छिलका उठाकर अपने मुँह में डाल लिया।

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अनिता ललित, 1 / 16 विवेक खंड, गोमतीनगर, लखनऊ, 226010

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