हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

इस हवा को क्या हुआ: संवेदनाओं की मुखर अभिव्यक्ति - डॉ. लवलेश दत्त

डॉ. लवलेश दत्त

सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य नाना प्रकार के संबंधों से एक दूसरे से जुड़ा रहता है। उसके ये संबंध कहीं प्रगाढ़ होते हैं तो कहीं सामान्य और कहीं-कहीं पर केवल औपचारिक ही होते हैं। संबंध का एक अलग अर्थ भी है जिसमें संबंध से तात्पर्य केवल उनसे नहीं है जो हमारे सम्पर्क में हैं या आते हैं बल्कि उनसे भी है जिन्हें हम अपने आस-पास देखते हैं, भले ही उनसे हमारा कुछ लेना-देना न हो। उन्हें देखते-देखते उनके प्रति हमारी संवेदनाएँ जन्म लेने लगती हैं और कहीं न कहीं हम उनके बारे में भी विचार करने लगते हैं। यही रचनाकार के आसपास के पर्यावरण को जन्म देता है। हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने अपनी पुस्तक ‘साहित्य सहचर’ में कहा है कि रचनाकार के पारिवारिक, सामाजिक और वैयक्तिक जीवन के साथ-साथ उसके आसपास के वातावरण तथा समकालीन रचना-शैली को ध्यान में रखकर ही उसकी रचनाओं का आकलन करना चाहिए। इस आधार पर जब हम रमेश गौतम के नवगीत -संग्रह ‘इस हवा को क्या हुआ’ का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि शत-प्रतिशत सच्ची संवेदनाओं को अपने शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति देने का स्तुत्य प्रयास गौतम जी ने किया है।

रमेश गौतम वर्तमान समय के जाने-माने नवगीतकार हैं। यद्यपि यह उनका प्रथम नवगीत संग्रह है किन्तु इसमें संकलित अधिकांश नवगीत विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। पुस्तक में कुल 80 नवगीत संग्रहीत हैं जिनमें सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक संवेदनाओं के साथ-साथ अपने वातावरण और परिवेश की विभिन्न सम-विषम परिस्थितियों को मुखर अभिव्यक्ति प्रदान की है। गौतम जी ने अपना प्रथम गीत हिन्दी भाषा को समर्पित किया है। इसके माध्यम से न केवल हिन्दी भाषा की गरिमा को स्थापित किया है बल्कि हिन्दी को देवी का स्थान देकर एक प्रकार से अपने ग्रंथ का मंगलाचरण प्रस्तुत किया है। वे लिखते हैं—

माँ अक्षरा अमृतमयी/ हिन्दी तुझे शत-शत नमन

तू ही चरण स्पर्श में/आशीष में मनुहार में

संवेदनाओं में बँधी / तू एकता परिवार में

संवाद में अनुवाद में/ तू आर्य भाषा की किरण

            गौतम जी की अपने समय पर भरपूर पकड़ है। वे समय को पूर्णरूप से जीने वाले रचनाकार हैं। अपने  समय की विद्रूपताओं को वे बखूबी अपने नवगीतों में अभिव्यक्त करते हैं। आज हर ओर एक अस्त-व्यस्त से जीवन को देखकर वे लिखते हैं—

                        बावली-सी खोजती-फिरतीं / दिशाएँ शाम को

                        लोग कितना भूल बैठे हैं / सुबह के नाम को

                        मंदिरों के द्वार पर / ठिठकी/ खड़ी हैं अर्चनाएँ

            उच्चाकांक्षाएँ किसके मन में नहीं होतीं? प्रायः प्रत्येक मनुष्य देवता होने का स्वप्न देखता है किन्तु गौतम जी ऐसा नहीं सोचते हैं। उनका मानना है कि देवता बनने के बाद तो और उलाहने मिलते हैं। लोग अनेक दोष निकालने लगते हैं। वे कहते हैं—

व्यर्थ है रोना/ यहाँ मत / देवता होना

कुछ नहीं / पाषाणधर्मी /रूप पाओगे

युद्ध में फिर/ दानवों से/ हार जाओगे

देवता होना/ स्वयं अस्तित्व का खोना

            आज के समय अच्छी बातें कोई सुनना नहीं चाहता। यदि कोई सुनता भी है तो बस दूसरे कान से निकालने के लिए। लोगों में नैतिक मूल्यों का महत्त्व ही नहीं रहा। जबकि भारतीय साहित्य ने सदैव मनुष्य के नैतिक उन्नयन की ही सीख दी है। अनेकानेक ग्रंथ नैतिक मूल्यों के उपदेशों से भरे पड़े हैं किन्तु वर्तमान समय में वह सब व्यर्थ है—

                        शब्द जो हमने बुने/ सिर्फ बहरों ने सुने

                        यह अँधेरी घाटियों की चीख है / मुट्ठियों में बंद केवल भीख है

                        बस रूई की गाँठ / जैसे हैं पड़े / मन करे जिसका धुने

            संवेदनाएँ ही हृदय की पीड़ा को जन्म देती हैं और उसी पीड़ा की मसि में गीतकार अपने लेखनी डुबो-डुबो कर दुख-सुख के गीतों का सृजन करता है। उसी से आशा की बातें लिखता है। समाज को नई दिशा देने की बात कहता है। गौतम जी लिखते हैं—

                        पीर के पलने में / पले हैं हम / उड़ाने यहीं से भरेंगे

                        रिक्त संवेदना से मिला है / सभ्यता का सजा हर स्वयंवर

                        वंशधर अक्षरों के यहाँ कब / हैं खिले कागज़ी फूल बनकर

                        छोड़कर / स्वर्णकेशा निमंत्रण / साथ भीगे नयन के दिखेंगे

            अपने प्रतिनिधि गीत ‘इस हवा को क्या हुआ’ में गौतम जी ने अपने समय को पूर्णतः रूपायित कर दिया है। आज के समय में हवा के अंदाज़ कब बदल जाएँ कुछ नहीं कहा जा सकता है। ऐसी विषम परिस्थितियों में न जाने कब क्या हो जाए। प्राणदायिनी हवा न जाने कब ज़हरीली हो जाए। इस सम्बन्ध में अपनी संवेदना को गौतम जी इस प्रकार व्यक्त करते हैं—

सच न जाने / इस हवा को / क्या हुआ

तितलियों की देह पर / चाकू चलाती यह हवा

जुगनुओं को धर्म के / रिश्ते बताती यह हवा

किस दिशा ने / इस हवा का/ तन छुआ

गौतम जी के सभी गीत एक से बढ़कर एक हैं। इनमें आत्मा की आवाज़ तो है ही साथ ही अपने समय की विभिन्न संवेदनाओं की भी मुखर अभिव्यंजना है। आज के वातावरण में असली-नकली, झूठ-सच, सही-गलत का पता लगाना बहुत मुश्किल हो गया है। गौतम जी लिखते हैं—

            सत्याग्रह के अर्थ / सिमटते देखे/ कोलाहल में

धुँधले बहुत हो गए अक्षर / कौन यहाँ पहचाने

सत्यमेव जयते के पन्ने / इतने हुए पुराने

किसको पड़ी / खिले ऊँचाई लेकर फिर दलदल में

            राजनीतिक व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए गौतम जी ने लिखा है—

                        सिंहासन बैठे बैरागी / बाँच रहे / गत-आगत को

                        तन तो पहना जोगिया बाना/भव-बंधन से दूर चला

                        मन के शयनकक्ष में बैठी/ खजुराहो की शिल्पकला

                        बोध कहाँ मिल पाता ऐसे/ दुविधाग्रस्त तथागत को

            मनुष्य नाना प्रकार के प्रयास करके अपने लिए एक छोटा सा घर बनाता है। इस आशा के साथ कि उसके घर में सदैव सुख-शान्ति और आनन्द का वातावरण रहेगा किन्तु हवा की दिशा कब बदल जाए किसके पता? अनेक प्रकार की समस्याएँ उस घर में विषम हवा के साथ आ ही जाती हैं। ऐसे में मनुष्य केवल स्वयं को दोष देकर संतोष करता है। कुछ ऐसी आत्म संवेदना को व्यक्त करते हुए गौतम जी लिखते हैं—

                                    गृह-प्रवेश होता / सफल कैसे/हमारे पाँव की अच्छे नहीं थे

                                    बनाया नीड़ था/कुछ धूप को कुछ छाँव को चुनकर

                                    घिर बादल, गिरी बिजली/खनकती चूड़ियाँ सुनकर

                                    समय का वार होता/ विफल कैसे/ हमारे ठाँव ही अच्छे नहीं थे।

            ‘इस हवा को क्या हुआ’ एक ऐसा नवगीत -संग्रह है जिसे जितनी बार पढ़ा जाए उसके अलग-अलग अर्थ सामने आते जाते हैं ठीक वैसे ही जैसे हवा अलग-अलग दिशाओं से चलती है। इस नवगीत संग्रह का कथ्य और शिल्प तो सराहनीय है ही इसके साथ ही इसका प्रकाशन तथा प्रस्तुतीकरण भी देखते ही बनता है। रमेश गौतम जी प्रतिष्ठित नवगीतकार होने के साथ-साथ सफल नवगीतकार हैं क्योंकि उनके गीतों में वही है जो उन्होंने जिया है, भोगा है और जिसको बहुत निकट से देखा है। सच तो यह है कि ये नवगीत उनकी संवेदना का दर्शन कराते हैं। यह एक संग्रहणीय एवं पठनीय पुस्तक है।

इस हवा को क्या हुआ (नवगीत संग्रह:रमेश गौतम पृष्ठ :208;मूल्य:400/- (सजिल्द,प्रकाशक:अयन प्रकाशन,1/20,महरौली दिल्ली-110030