हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

भाषा,संस्कृति और समाज - डॉ.गुणशेखर

                  जंगल से बाहर आए तो अरसा बीत गया 
                     इंसानों में फिर भी बाक़ी कितना जंगल है ।


    इन दिनों अपने देश में संस्कृति ,संस्कृति का बहुत शोर है। सभ्यता और संस्कृति  की बात करके और उस पर दो-चार जुमले जड़कर अपने को सभ्य व सुसंस्कृत कहलाने तथा दिखलाने का प्रचलन भी खूब बढ़ा है। लेकिन आचरण में वह नहीं है जो शब्दों में है। संस्कृति-संस्कृति चिल्ला रहे हैं भाषा में से संस्कृति लुप्त होती जा रही है। भाषा और भाव से हम असंस्कृत होते जा रहे हैं। आज हम शहरों में बस गए हैं और जंगल हममें। इस तरह के आचरण पर कमलेश भट्ट ‘कमल’ का उपर्युक्त शेर हमें बहुत याद आया। यह बात हम केवल अपने भारतीयों के संदर्भ में ही क्यों कह रहे हैं?यह इसलिए कि इस समय सारी दुनिया में सार्वभौमिक संस्कृति (ग्लोबल कल्चर) की चर्चा ज़ोरों पर है और हम इसकी पोषक जीवन-सुधामयी अपनी ही सामासिक  संस्कृति को गँवाने पर तुले बैठे हैं।सबसे पहले यह अवधारणा हमारी प्राचीन संस्कृति में आई। हमने ‘वसुधैव  कुटुंबकम्’  का नारा ही नहीं दिया,सारी दुनिया को सच में गले लगाया। प्रकृति प्रेमी ऋषियों ने जंगलों में नदियों के किनारे ऋचाएँ रचीं।वे जंगल में बसे लेकिन जंगल उनमें नहीं बसा। इसीलिए उनके यहाँ हिंसक पशु तक अहिंसक होकर रहे। किसी ऋषि के आश्रम में सिंह के दाँत गिनते भरत दुनिया के दूसरे हिस्सों में नहीं पैदा हुए। हम अहिंसक थे पर कायर नहीं। इसीलिए दुष्यंत ने हिरण के बच्चे के दाँत नहीं गिने । सिंह के गिने।  भगवान महावीर स्वामी ने अहिंसा को संसार के कल्याण  का मूल माना।जब हम हिंसा ही नहीं करेंगे तो किसी का अहित कैसे होगा। बहुत बड़ा चिंतन है यह ।कल्याण का केंद्र है यह चिंतन। संसार के कल्याण की नाभिक में यही अहिंसा परमाणु ऊर्जा की तरह व्याप्त  है। इस लिए वे स्वर्ण-सिंहासन वाले राजपाट को त्यागकर लोक के कल्याण हेतु कठोर तप करते-करतेअपनी देह तक को भूल बैठे थे । भगवान बुद्ध ने तो दुनिया के कल्याण के लिए न केवल राज-पाट छोड़ा बल्कि अपनी प्राणप्रिया और पुत्र तक को त्यागा। इतने बड़े त्याग की मिसाल किसी दूसरी संस्कृति में नहीं मिलती।
         
        संस्कृति वायवीय नहीं है। इसीलिए इसको नष्ट करने में राजसत्ताएँ प्रायः असफल रहती आई हैं और समय पाकर इसी संस्कृति के बल पर वे पुनः धूल चाटती हुई भी मिली  हैं।जब-जब हमारी संस्कृति के बादलों का जल पीने पर तुले संकट के मेघनाद हुए हैं (काले बादल जब-जब  घिरे हैं ) तो उनको  नियंत्रित करने के लिए ,विश्वामित्र और चाणक्य जैसा कोई न कोई संस्कृति चेता नए-नए लक्ष्मण ,राम और चंद्र्गुप्तों के निर्माण में लग गया  है।इसलिए भी हमारा समाज निश्चिंत होकर भगवान के भरोसे बैठ जाता रहा है। उसे पता है कि ” जब-जब होहिं धर्म की हानी ….  “ईश्वर अवतार लेकर उनके दुख हरेगा। लेकिन वे भूल जाते हैं कि हमारी संस्कृति अलस और अकर्मा बैठे रहने की नहीं है। जो ईश्वर संकट के समय अवतार लेने का आश्वासन देता है वही ”कर्मण्ये वा अधिकारस्ते कहकर कर्म की भी तो प्रेरणा देता है।”  
          बहुत से लोग संस्कृतिऔर सभ्यता का घालमेल करके संस्कृति को वायवीय बना देते हैं। इसके लिए एक उदाहरण वस्त्र का लेते हैं। सभ्यता वस्त्र है तो संस्कृति उसको चमकाने वाली आभा।कपड़ा बहुत सुंदर है। रंगीन है । उसपर बेलबूटे कढ़े हैं। कपड़े को सुंदर बनाने में रंग का भी योगदान है और बेलबूटों का भी। जब सब स्वतंत्र थे तो अलग-अलग नाम थे ,अब मिलकर रंगीन वस्त्र  हो गए। इसी तरह सभ्यता और संस्कृति अंतर्गुंफित हैं । पर,जैसे कपड़ा ही रंग नहीं है और रंग ही कपड़ा। वैसे ही सभ्यता और संस्कृति अन्योन्याश्रित तो हैं पर एक कदापि नहीं। संस्कृति विलेय है अविलेय नहीं। वह आभा जो रंगों से आती है। वह आभा जो भीतर के रेशों से उभरकर आती है। हमें उस आभा को,चमक को बनाए रखने के लिए सभ्यताके धागों के तंतुओं तक रंग को जाने देना होगा।उसमें समाने देना होगा। चलो ,छोड़ो !यह उदाहरण थोड़ा सूक्ष्म हो गया। अब हम एक स्थूल उदाहरण लेते हैं । मानव समाज को एक वृक्ष मान लेते हैं। समाज को वृक्ष मान लेने पर सभ्यता उसके  लता,पल्लव और फल-फूल के रूप में स्पष्टतः दृश्य है लेकिन ये सब तभी तक हैं, जब तक उस वृक्ष के भीतर प्रवाहित अदृश्य संस्कृति ( नाना सांस्कृतिक क्रिया कलाप )का रस मौजूद है। उसके सूखते ही समाज रूपी वृक्ष ठूँठ हो जाता है। उसकी हरियाली गायब हो जाती है। फल-फूल लुप्त हो जाते हैं। 
       ताज़महल मुगलकालीन भारतीय सभ्यता का उत्कृष्ट स्थापत्य है। यदि यह सभ्यता का उत्कृष्ट उदाहरण है  तो उसके भीतर दफ्न मुमताज़ के प्रति शाहजहाँ का अटूट प्रेम उस भारतीय संस्कृति का जो अपनी प्राणप्रिया सीता के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम में है। राधा के लिए कृष्ण  और उर्वशी के लिए पुररुवा के हृदय में है ।प्रेम के पुजारी शाहजहाँ को प्रेम के आवेश वश पता ही नहीं रहता कि इस्लाम बुतपरस्ती के खिलाफ़ है। उसे अपने दीन से भी अकूत प्रेम है जो स्थापत्य में है और उस मुमताज़ से भी है,जो  उसे छोड़कर चली गई है। वह तो अपनी प्राणप्रिया की स्मृति सँजोने के लिए बेचैन था। इसलिए वह ताज़महल -सा प्यारा अप्रतिम स्थूल प्रेम प्रतीक बना बैठा। स्थूल  प्रतीक क्या हैं? प्रकारांतर से मूर्ति या बुत ही तो हैं। पर,वह प्रेम की आतुरता में दृश्य -अदृश्य सब भूल बैठता है।संस्कृति भी और है क्या?यही आतुरता या बेचैनी ही तो संस्कृति है। दृश्य को अदृश्य कर देने की जादुई ताकत इस संस्कृति में है।मूलतः यह हमारे उत्कृष्ट संस्कारों की भावात्मक थाती है,जो समय-समय पर हमारे नाना उत्सवों,परंपराओं,…… में जीवंत होती रहती है। चूँकि यह भाव वाचक संज्ञा है,इसलिए इसको आश्रय की आवश्यकता होती है। 
       संस्कृति और समाज के साथ-साथ भाषा को भी समझते चलें। संस्कृति अपने समकालीन समाज के परीक्षित उत्कृष्ट  मूल्यों की अधिष्ठात्री है तो संस्कृति और समाज को जोड़ने वाली महत्त्वपूर्ण कड़ी है भाषा। हर समाज की अपनी भाषा होती है। सांस्कृतिक मूल्यों की यह व्याख्याता भाषा ध्वन्यात्मक भी हो सकती है और प्रतीकात्मक भी । प्रतीकात्मक भाषा में वह लिखता है। चित्र बनाता है और ध्वन्यात्मक में बोलता है। प्रेम करता है। गुस्सा करता है। अभिव्यक्ति हर समाज की ज़रूरत होती है।इस अभियक्ति के लिए भाषा की ज़रूरत होती है ,जो हर समाज में लिखित हो या मौखिक  पर होती अवश्य है। उस भाषा में वह अपनी भौतिक आवश्यकताओं और सांस्कृतिक अभिलाषाओं की अभिव्यक्ति करता है। अभिव्यक्ति मुख्य है,व्यक्ति या उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं। इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह कल्पनाओं को स्वर देता है या रेखाओं में बदलता है।लेकिन फिर भी स्थायित्त्व के लिए स्वर की अपेक्षा रेखाएँ ही अधिक कारगर सिद्ध हुई हैं। भाषाएँ अपने इसी लिखित रूप के बलपर संचार का प्रमुख साधन बनी हैं। खैर!संचार क्रान्ति के इस युग मेंअब तो फिर से मुख प्रमुख होने लगा है।किंतु इससे लिखे हुए की महत्ता कम नहीं हो जाती।    
      “भाषा, संस्कृति और समाज आपस में इतने घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं कि बिना एक को समझे दूसरे को समझना अकल्पनीय है। यदि भाषा और संस्कृति को समाज विशेष के संदर्भ में ही समझा जा सकता है तो यह भी उतना ही सच है कि भाषा और संस्कृति को समझे बिना किसी समाज को समझना असंभव है।……एक संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की आज व्यापक उपस्थिति है और इसमें भारतीय सांस्कृतिक चेतना का स्पंदन है। ….. भाषा स्वयं एक सांस्कृतिक प्रक्रिया का ऐसा अभिन्न हिस्सा होती है,जो संस्कृति रचती भी है और स्वयं संस्कृति द्वारा रची भी जाती है।”आज जब मैं अपने देश से बाहर हूँ तो प्रो.गिरीश्वर मिश्र मेरे लिए पहले से अधिक  प्रासंगिक हो उठते हैं। उनकी भाषा, संस्कृति और समाज पर की गई यह टिप्पणी हमें सोचने को विवश करती है कि कोई भाषा जब अपने देश और समाज में होती है तब तो उनकी बात सटीक है।  पर,क्या जब वह अपने देश से बाहर निकलकर दूसरे देश और समाज में प्रवेश करती है तो भी वैसी ही प्रभावशाली रहती है?आखिर  विदेशी परिवेश में वह  किस  रूप में रहती है?यानी उसका स्वरूप कैसा होता है?क्या वह अपनी संस्कृति को लेकर यात्रा करती है या फिर जिस देश और परिवेश में जाती है ,उसी में लय हो जाती है?केवल उसकी देह रह जाती है, जिसमें उस देश की संस्कृति समा जाती है। उत्तर खोजें तो यही मिलता है कि कोई भी भाषा जब यात्रा पर निकलती है तो निष्प्राण होकर नहीं,सप्राण निकलती है। वह केवल काले-काले अक्षर लेकर ही नहीं निकलती । उसकी यात्रा एक कारवाँ होती है, जिसमें उसका परिवेश,परंपराएँ,सभ्यता और संस्कृति का समूचा कुनबा साथ होता है। उस कुनबे में कला होती है।उसमें साहित्य का भंडार भी होता है। इसलिए यह कहना कि भाषा अकेले यात्रा करती है ठीक न होगा। वह कितनी भी दूर चली जाए ,कितने समुद्रों को क्यों न पार कर ले ,जहाँ भी जाती है ,जिस भी कठिन से कठिन दुर्ग में प्रवेश करती है ,अपना सांस्कृतिक ढाँचा मिटाकर नहीं, उसे साथ लेकर प्रवेश करती है।

          भाषा जिसे मैं जी रहा हूँ,उसकी सामासिकता पर लिखूँ कि उसमें समाई और दुनियाभर में अपनी यश वेलि फैलाए भारतीय संस्कृति की व्यास वृत्ति पर।दोनों वृहद विषय हैं। दोनों में से किसी में हाथ डालने से पहले गहन अध्ययन की थाती ज़रूरी है। मैं तो इन  दोनों में अकिंचन हूँ। इसी असमंजस की स्थिति में महाकवि कालिदास  याद आ गए। उनका एक श्लोकांश ,”प्रांशुलभ्ये फले लोभाद् बाहुरिव बामनः।”स्मरण  आते ही मुझे बल मिल गया कि कोशिश करने में क्या हर्ज़ है। जब एक बामन यह जानते   हुए भी  कि  उसके सिर के ऊपर बहुत ऊँचे लटकते फल उसे नहीं मिलने वाले फिर भी लोभ वश  हाथ उठा देता है तो मैं तो छह फुटा जवान( अब तो अधबूढ़ा ) क्यों नहीं? लेकिन शरीर और ज्ञान में अंतर होता है। ज्ञान में तो मैं बामन ही हूँ तो उसी बामन की तरह  ही सही पर मेरी भी  बाँह(कलम)  लोभ वश उठ ही  गई।

        वह भाषा  जिसे  बोल-बोल कर मैं बड़ा हुआ हूँ,जिसके सहारे कंकरीले-पथरीले,कँटीले और पेंचदार (बुरी तरह तरह भुला देने वाले )मोड़ों से भरे सारे रास्ते पूछ-पूछ कर पार करते हुए अपनी मंज़िल तक पहुँचा हूँ,जो  माँ के दुग्धपान के साथ-साथ लोरियों की घुट्टियों में मिली है ,उसकी मिठास और महक लेकर जहाँ भी जाता हूँ, अलग से पहचाना जाता हूँ। यह भाषा का ही दम है जिसने स्वामी विवेकानंद के विश्व धर्म सम्मेलन में ‘भाइयो और बहनो!’मात्र कहने पर अमरीका वासियों पर जादुई असर डाला था।  वह ऐतिहासिक भाषण किसी से अविदित नहीं है। इसके बाद  भूतपूर्व प्रधान मंत्री  अटल बिहारी वाजपेयी जी के स्वरों में जब यह संयुक्त राष्ट्र संघ में  गूँजी तो सभी आश्चर्याभिभूत हो गए थे। यह है अपनी भाषा हिंदी की महक और मिठास।यह दुनिया भर में फैली तो न तो लाठी के बल पर और न ही व्यापार की जरूरतों और उसकी शर्तों पर। बस यह अपनी मिठास और महक से सभी की प्यारी बनी । अभी तो इसने अपने व्यावसायिक महत्त्व को भी सिद्ध कर दिया है।

           मैं चीन पहुँचा तो सबसे पहले मेरी भाषा में स्वागत हुआ। यह स्वागतकर्त्री अपने देश की नहीं चीनी महिला थीं, श्रीमती त्यान केपिंग । वे जिसमें मैं हूँ ,उसी गुआंगडोंग वैदेशिक भाषा विश्वविद्यालय में हिन्दी की सहायक प्रोफेसर हैं।विदेशी धरती पर अपनी भाषा का स्वर मुझे आश्वस्तिकारी लगा। इस अकेले स्वर में इतना दम था कि चीन की धरती पर कदम रखने के पहले जो डर था,सब धूरिधूसरित हो गया। यह है भाषा और उसका सामर्थ्य ।

           विश्वविद्यालय में कदम रखते ही हिंदी पढ़ने वाले बच्चों की एक टोली दिखी ,वह मेरी ओर दौड़ पड़ी। दोनों हाथ जोड़े हुए  झुक-झुक कर  ‘नमस्ते जी !नमस्ते जी!’ की झड़ी लग गई!वह स्वागत मेरा कम  मेरी संस्कृति का अधिक था। इसलिए हृदय गदगद हो उठा था। वे मुझसे नहीं मेरी भाषा हिंदी से थोड़ा-बहुत परिचित थे। उन्हें भाषा के माध्यम से भारतीय संस्कृति का जितना और जो ज्ञान मिला था उसी सीमा में हमारा सम्मान कर रहे थे। कुछ समय बिताने के बाद मुझसे वे खुलने लगे। अभी उनके तरह-तरह के प्रश्न मुझे सोचने को विवश करने लगे कि अपनी संस्कृति के विषय में अपनी खुद की समझ कितनी कम है।
         यहाँ कोई लड़की काका कालेलकर को पढ़ती है तो कोई प्रेमचंद को। कोई महादेवी को। कोई गुरुदेव को। कवींद्र रवींद्र को मुझसे समझने की होड़ लगाए ये बच्चे क्या जानें कि हम अपनी संस्कृति की जड़ों से कटे हुए हैं। मैं इनका ऋणी हूँ कि इन्होंने मेरी उन कटी जड़ों को  सींचकर हरा किया । उस ज्ञानवल्लरी में अब तो पुष्प-पल्लव भी दिखने लगे हैं।एक छात्रा ने काका कालेलकर का साहित्य पढ़ते हुए जो कठिनाइयाँ सामने पाईं,उनके निवारण के लिए मुझे पत्र लिखा- “हमारा अन्न कीचड़ में ही पैदा होता है इसका जाग्रत् भान यदि हर एक मनुष्य को होता तो वह कभी कीचड़ का तिरस्कार न करता ” इस वाक्य में “जाग्रत् भान ” का  क्या मतलब है?” उसने केवल ‘जाग्रत भान’ का अर्थ पूछा ,इसका अर्थ है शेष उसे स्वयं समझ में आता है।काका कालेलकर के गाँव से हज़ारों किलोमीटर दूर बैठी ,शहर की पली-बढ़ी यह बच्ची मिट्टी ,कीचड़ और उसमें उपजे जीवनदायी अन्न को गंभीरता से समझना चाहती है। यह है किसी भाषा की क्षमता जो अपनी परिव्याप्ति में इतना बड़ा भूभाग समेट लेती है।भाषा बिना वीज़ा और पासपोर्ट  के यात्रा करती है ; क्योंकि वह हर अपनाने वाले की  नितांत  अपनी भी हो जाती है,गैर नहीं रह जाती । इतनी अपनी कि संतति वत्सला माँ -सी ममतमयी। इसी अपनत्त्व के कारण यहाँ की एक शिक्षिका हिंदी को अपनी दूसरी मातृ भाषा कहकर गौरव का अनुभव करती है।    

           संवेदना हमें संस्कृत बनाती है और ज्ञान सभ्य।यह विचित्र संयोग है कि संवेदना जितने करीब आती जाती है ज्ञान हमसे उतना ही दूर होता जाता है। माँ अपने ममत्त्व की संवेदना के कारण ही माँ कहलाती है । वह जो बेटी को गर्भ में मरवाती है,माँ हो ही नहीं सकती। माँ खुद मर सकती है पर वात्सल्य की हत्या नहीं कर सकती। संस्कृति माँ है तो सभ्यता उसकी ममता । माँ और ममता दोनों अलग नहीं हैं। इन्हें अलगाने की ज़रूरत भी नहीं है लेकिन दोनों की पहचान जरूरी है। मध्य प्रदेश या कहाँ की घटना है ठीक से याद नहीं पर उसकी संवेदना का उदाहरण यहाँ देना चाहता हूँ। यह  अभी कुछ ही दिनों पहले की घटना है। घटना यह है कि कपड़े धो रही एक लड़की का पैर अचानक एक घड़ियाल ने अपने भयंकर मुँह में धर लिया । माँ ने देखा  तो एक हाथ से बेटी को पकड़ा और दूसरे से घड़ियाल के थूथन पर कपड़े धोने वाले पीटने से निरंतर वार करने लगी । इस बीच उसे होश ही नहीं रहा  कि घड़ियाल कब उसकी बेटी को छोड़ के चला गया । संवेदना की तीव्रता में अपने जीवन को बचाने का ज्ञान भुला जाता है। सारे खतरे भुला जाते हैं। माँ को तो बस अपनी बेटी ध्यान में थी। इसलिए वह मगरमच्छ के साथ युद्ध में कूद गई। उसे तो इस बात का होश ही नहीं रहा कि दूसरा मगरमच्छ भी हो सकता है।भयंकर और ताकतवर मगरमच्छ बेटी के साथ उसे भी शिकार बना सकता है।  इसी तरह मैं भी तैरना न जानते हुए एक मित्र को बचाने नदी में कूद गया था। मेरे बाद मुझे बचाने के लिए एक और मित्र कूद गया था । जिसे बचाने मैं कूदा था वह अपनी बेटी को बचाने के लिए कूदा था। यह संवेदना ही तो हमारी भारतीय संस्कृति की थाती है,जो मगरमच्छ से लड़वाती है,नदी में कुदवाती है। जैसे माँ की थाती ममता है वैसे ही संस्कृति की थाती संवेदना है। आधुनिक समाज में यह भी रिस रही है। 
    भगवान  महावीर में मानवीय कल्याण की भावना और उसके प्रति अपनत्त्व की संवेदना इतनी तीव्र हो गई थी कि उन्हें इस बात का ज्ञान ही नहीं रह गया कि उनके शरीर पर कपड़े हैं भी कि नहीं। यह संवेदना चाहे व्यक्ति के लिए हो,समाज या  देश के लिए अगर हम सभी में बराबर और परस्पर प्रवाहित होती रहे तो दूरी कभी बन ही नहीं सकती। एक छात्रा रूपा ‘देवों के देव महादेव ‘ जैसे धारावाहिक की पटकथा का मंडारिन(चीनी)में अनुवाद कर रही है। अब जाकर मुझे पता चला कि कैलाश मानसरोवर चीन में ही क्यों है। यह धारावाहिक मूल हिन्दी में चीन में देखा जाना हमें हतप्रभ करता है। नीचे चीनी भाषा में रूपान्तरण केवल शीर्षक रूप (caption)में रहते हैं।उसमें उदारता बस उस लड़की ने मुझे सम्मिलित किया है और नाम भी दिया है।  एक दिन अपने भाषण में यहाँ की छात्रा सुश्री झाङ्ग्छिन (हिंदी नाम शांति )ने कहा कि,”अभी  चीन और भारत पड़ोसी होकर भी अजनबी से हैं। यह अजनबीपन अब आगे नहीं रहेगा ,क्योंकि अब हम हैं।” इससे मैं मुग्ध होकर रह गया कि यहाँ की नई पीढ़ी भारत-चीन संबंधों के प्रति कितनी संवेदनशील है। इनमें भारत और उसकी संस्कृति के प्रति असीम लगाव है। यह हिंदी और हिंदुस्तान दोनों की तरक्की के प्रति आशा जगाती है। लेकिन हमें भी इनके बढ़े हुए हाथों को गर्मजोशी के साथ थामने की ज़रूरत है।

       संस्कृति और सभ्यता क्या है?यदि इसे एक ही वाक्य में परिभाषित करना हो तो मैं कहूँगा संस्कृति  प्रेरणा है और सभ्यता उसका भौतिक परिणाम । प्रेम के कारण स्त्री-पुरुष निकट आते हैं। निकट आने के तरीके कई हो सकते हैं। इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन अँगूठी पहनाता है ,कौन सिंदूर  भरता है। कौन दुल्हन साड़ी पहनती है और कौन गाउन। कोई दूल्हा भीड़ के साथ ढोल बजाते हुए प्रिया के आँगन तक जाता है।  कोई गिरिजाघर से शान्तिपूर्ण ढंग से ब्याह के  लाता है। ये तरीके सभ्यता के रूप हैं और इनकी मूल प्रेरणा प्रीति(प्रेम) है ‘संस्कृति’। राम हरी गई सीता को छोड़कर कोई नई अर्धांगिनी बना सकते थे । जान हथेली पर रखकर समुद्र पार जाकर रावण से युद्ध करके उसे लाने की क्या ज़रूरत थी?ज़रूरत थी । उसके पीछे प्रीति है।यह रहस्यमय प्रीति  ही संस्कृति है। प्रीति के मर्म और उसके रहस्य को समझने के बाद ही राम -रावण  युद्ध को सही या गलत ठहराया जा सकता है। यह युद्ध दो संस्कृतियों का युद्ध था।एक संस्कृति में स्त्री की देह प्रमुख थी ,दूसरे में उसकी आत्मीयता। रावण बिना आत्मीयता के भी सीता को पत्नी बनाने को तैयार था लेकिन सीता नहीं । सीता रावण के लिए रमणी हो सकती थी पर राम के लिए  नहीं। यही इन दो  संस्कृतियों का मुख्य भेद है।  
        यहाँ के विद्यार्थियों से चर्चा  के दौरान मैंने उनसे भाषा और संस्कृति का संबंध पूछा । इस पर उन्होंने बड़ी संज़ीदगी से उत्तर दिए। उनमें से कइयों के उत्तरों ने प्रभावित किया । किसी ने कहा कि लोकोक्तियों और मुहावरों पर संस्कृति की स्पष्ट छाप होती है । किसी ने कहा कि भाषा संस्कृति को  ज़िंदा रखती है। कहने का अभिप्राय यह कि प्रायः सभी ने अपने-अपने ढंग से भाषा और संस्कृति के अटूट रिश्ते पर प्रकाश डाला।सबके उत्तरों को तो यहाँ नहीं दिया जा सकता क्योंकि सबके उत्तर मिलकर अनेक पृष्ठ घेरेंगे। एक छात्र सुरेश का उत्तर तो स्वतंत्र आलेख ही बन गया है।  इन सबके उत्तरों को समेकित रूप से कहें तो कह सकते हैं कि ,’भाषा संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । भाषा संस्कृति के प्रसार में एक अहम भूमिका निभाती रही है।भाषा की बदौलत ही  संस्कृति को पूरी दुनिया में प्रसारित किया जा  सका है । भाषा की बदौलत ही संस्कृति को आगे भी पीढ़ी दर पीढ़ी रूपांतरित किया जा सकेगा। साहित्य जो संस्कृति का अटूट हिस्सा है उसे भाषा के बल पर ही आगे का समाज पढ़ पाएगा,सीख पाएगा।उसे हस्तांतरित कर पाएगा।भाषा के बल पर ही  इसका प्रसारण किया जाता रहा है और आगे भी किया जाएगा ।’ इन बच्चों के कहने का अभिप्राय यह कि भाषा संस्कृति की   संवाहिका है, जिससे एक देश या जाति के जीवन मूल्य, परंपराएँ और विश्वास आदि का पता चलता है।भाषा और संस्कृति दोनों के बीच गहरा पारस्परिक संबंध ,प्रभाव और जुड़ाव होता है।जब भी हम किसी दूसरे देश की संस्कृति का अवगाहन करना चाहेंगे  तो हमें उसकी  भाषा को समझना ज़रूरी होगा और अगर उसकी भाषा को पूरी तरह समझना चाहेंगे  तो उसकी संस्कृति को गहराई से समझना होगा।’ 

-डॉ.  गंगा प्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’