हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

मेरे भाग्य से जुड़ा हुआ भारत - अंजलि

दशहरा पर भारत  वासियों के बीच मैं खड़ी हुई थी और हज़ारों धड़कते हुए दिलों के साथ मैं इन्तज़ार कर रही थी रावण के गिरने और उसके घमंड के चूर -चूर हो जाने का। जब धुआँ रावण के घास से बने शरीर से निकलने लगा, तब शंख की तेज़ आवाज़ चारों ओर से घहराने लगी। आखिर रावण गिर गया, चाहे वह कितना ताकतवर और घमंडी क्यों न रहा हो।

प्रतीकों के माध्यम से भारत में सदगुणों की पूजा की जाती है। त्योहारों के पीछे छिपे हुए आदर्श उपदेश लोगों तक पहुंचाने के लिए भिन्न-भिन्न रूपों में प्रस्तुत किया जाता है। तत्वत: परम सत्य है निराकार ब्रह्म; लेकिन उस ब्रह्म  में लीन होने की प्रक्रिया बड़ी ही दुरूह एवं जटिल है।

उसी ब्रह्म की तलाश में मैं दुबारा भारत में आई हूँ। दो वर्ष  पूर्व जब मैंने पहली बार अपने कद़म भारत उपमहाद्वीप में  रखे थे,एक नवजात बच्चे की तरह  जिज्ञासा के साथ अपरिचित विषयों के पीछे भागती रहती थी। एक बार मैं ऋषिकेश गई थी,वहाँ मैंने स्नान करके खुले में नंग- धड़ंग पड़े  रहने वाले ऋषि-मुनियों को देखा। वे इतना सरल जीवन जीते हैं ,मानो अम्बर ही वस्त्र के रूप में उनके शरीरों को आवरण बनकर ढका करता है। उनसे मैं इतना प्रभावित हुई  कि संन्यासी की तरह आध्यात्मिक स्तर पर जीना मेरा भी जीवन- उद्देश्य बन गया। उसी उद्देश्य ने मुझे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत केंद्र तक खींच लिया। सौभाग्य से मुझे एक  सहपाठी के रूप में ब्राह्मण रत्न प्राप्त हुआ। चार्वाक के दर्शन  से  अप्रभावित  मेरे  चोटी  वाले ब्राह्मण सहपाठियों का चित्त एकदम शुद्ध है। वे ज्ञान के प्रभा मंडल से  हमेशा प्रकाशित रहते हैं। इनके जैसे बड़े-बड़े विद्वानों के सामने मुझे अपने अज्ञान पर शर्म आती है। वह इसलिए कि किताबों में जो भी जीवन दर्शन के  विषय बताए जाते हैं, वे तब तक अविद्या रहेंगे, जब तक इन्हें व्यवहार में न लाया जाए। मेरे सहपाठी इतने पढ़े-लिखे होकर भी विनम्रता से भरे रहते हैं l मोटे से मोटे ग्रंथों का अध्ययन करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। साथ ही साथ वे मुझे विद्या का प्रदान करना, मेरी देखभाल करना  अपना कर्तव्य मानते हैं।

कई दिनों पहले नवरात्र का शुभ उत्सव था। मेरी कक्षा के मध्य प्रदेश  के एक लड़के ने नौ दिनों के लिए उपवास रखा था। मुझे आश्चर्य  हुआ कि एक लंबा लड़का बिना खाए पीए कैसे परीक्षा दे  पाएगा। तब उसने जवाब दिया कि भूख से उसे शांति मिलती है। मैंने मन ही मन कहा, क्या जवाब है! भूख के मारे मैं हमेशा अपने दिमाग में रोटी-दाल का चित्र बनाकर रखती हूँ। केवल खाने से ही मेरी चंचल इच्छा बुझ  पाती है । योगियों को बाह्य विषयों से  कोई मतलब नहीं है। संन्यासी के जीने का रूप जो मैंने देखा है, वह केवल शाश्वत सत्य की प्राप्ति के हेतु अपनाई जाने वाली एक कार्य  शैली है। यदि मुझे शांति  ढूँढना है ,तो आंतरिक रूप से  अपनी आत्मा  का स्वरूप पहचानना पड़ेगा। 

हमारी कक्षा में अधिकतर छात्रों ने गुरुकुल के परंपरा से शिक्षा प्राप्त की। श्रुति-स्मृति का बार-बार मंगल  उच्चारण करके देवी सरस्वती भी उनके मुख -कण्ठ में आकर निवास करती हैं। अब उन बेचारों को  जे एन यू में आकर शुद्ध शाकाहार न मिलने से उन्हें बाहर जाकर मंदिर में भोजन करना पड़ता है।  वे अपना कीमती समय निकालकर मेरे साथ चर्चा किया करते हैं। किसी भी चट्टान पर बैठकर वे मेरा संशय को  दूर करने में  मदद करते हैं। अर्थ सहित वर्णमाला उनके होंठों से निकलती रहती है, गोमुख से निकले गंगा के प्रवाह की तरह इसकी शीतलता और मधुरता की कोई सीमा  नहीं। असल में वे मेरे गुरु जी हो गए, और उनका उपदेश उपनिषद।

 अब तो लगता है कि जैसे मेरे पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण मेरे भाग्य से जुड़ा है भारत,जिस कारण से

इन प्रतिष्ठित एवं उत्कृष्ट जाति के सज्जनों से  मिल पाई और इनसे मिलकर मैं इतना प्रेरित  हुई  कि मैं  भी इनकी तरह संस्कृत  की संरक्षक तथा प्रचारक बनने के लिए प्रयत्न करूँगी।  इसी वजह से भारत मेरे लिए हमेशा प्रिय और पवित्र देश है और रहेगा, जिसे मैं कभी भी अलविदा नहीं कह पाऊँगी। [ अंजली, चीन ]