हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

हिन्दी चेतना के बीस वर्ष - महाकवि प्रो. हरिशंकर 'आदेश '

हिन्दी केवल भारत में निवास करने वाले भारतीयों की ही नहीं, अपितु समस्त संसार में बसने वाले भारतवंशियो की भाषा है। टोरॉन्टो में हिन्दी को जीवित एवं जीवंत बनाए रखने वाले हिन्दी के अग्रगण्य नायकों में श्री श्याम त्रिपाठी जी का विशेष स्थान है। स्वर्गीय डा. हरिवंश राय बच्चन की भाँति आंग्ल भाषा में परास्नातक की उपाधि प्राप्त करने वाले श्री श्याम त्रिपाठी जी ने भी हिन्दी की भरसक सेवा की है। आज  कनाडा , विशेषकर मेट्रो टोरॉन्टो के हिन्दी उन्नायकों में उनका नाम  बड़े आदर और प्रेम से लिया जाता है। कनाडा में स्तरीय हिन्दी पत्रिका के नियमित रूप से प्रकाशित करने के क्षेत्र में त्रिपाठी जी का योगदान उल्लेखनीय है।  इससे पूर्व श्री त्रिलोचन सिंह गिल की नन्ही -सी पत्रिका ‘भारती’ तथा हिन्दी परिषद् की ‘हिन्दी संवाद’ नामक पत्रिका यदा-कदा प्रकाशित हो जाती थी। त्रिपाठी जी ने हिन्दी चेतना प्रकाशित करने का जो बीड़ा मेरे समक्ष मेरे आवास पर उठाया, उसे उन्होंने प्राणपण से पूर्ण किया है।अंतर्राष्ट्रीय त्रौमासिक हिन्दी पत्रिका ’हिन्दी चेतना’ की दो दशक की यात्रा अत्यन्त उपलब्धिपूर्ण तथा सराहनीय रही है। तदर्थ त्रिपाठी-दम्पति को बधाई।

आज के युग में भारत से बाहर किसी हिन्दी – पत्रिका का एक वर्ष तक भी सुचारु रूप से चल जाना बड़ी उपलब्धि मानी जाती है ; परन्तु हिन्दी चेतना की उत्तरोत्तर  बढ़ती हुई लोकप्रियता श्लाघ्य है। इसका श्रेय श्री श्याम त्रिपाठी, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सुरेखा त्रिपाठी तथा हिन्दी-चेतना परिवार के सदस्यों को है। इसमें मुख्य भूमिका श्री श्याम त्रिपाठी जी की रही है। हिन्दी चेतना के श्रीगणेश अथवा गर्भधान की बेला में  मैं भी वहां एक पुरोधा के समान विद्यमान था। अतः इसकी   योजना-निर्माण  में मेरी भी संक्षिप्त परंतु सक्रिय भूमिका रही है। मुझे स्मरण है कि बीस वर्ष पूर्व श्री श्याम त्रिपाठी जी मेरे कनाडा स्थित आवास पर आए। उस समय वे विश्व हिन्दू परिषद कनाडा के अध्यक्ष तथा हिन्दू चेतना पत्रिका के जनक तथा संपादक थे।   त्रिपाठी जी अपने जीवन के आदि काल से ही अत्यन्त कर्मठ तथा सक्रिय  व्यक्ति रहे हैं। हिन्दी पत्रिका के प्रकाशन तथा नाम की बात चली। मेरे मुख से अनायास निःसृत हो गया कि हिन्दू चेतना नहीं ,अब इसका नाम  ‘हिन्दी चेतना’  कर दीजिए। परन्तु मैं इस नामकरण का श्रेय बहिन सुरेखा से नहीं छीनना चाहता; क्योंकि एक बार अपने किसी लेख में श्याम त्रिपाठी ने कहा था-‘इस पत्रिका का नाम श्रीमती सुरेखा त्रिपाठी द्वारा दिया गया था। अस्तु, मेरे यहाँ एक सप्ताह पश्चात् विश्वविख्यात् विश्वयात्री आदरणीय स्वर्गीय यशपाल जैन तथा उनके परिवार के स्वागत में एक विराट कवि सम्मेलन की आयोजना की गई थी।  श्याम त्रिपाठी की कर्मठता सराहनीय थी, जब उस एक सप्ताह में हिन्दी चेतना का प्रथम अंक तैयार कर दिया और उसका विमोचन स्वर्गीय श्री यशपाल जैन के हाथों हुआ। त्रिपाठी जी को संभवतः स्मरण नहीं होगा कि हिन्दी चेतना का दूसरा अंक अटलांटा में मेरे पुत्र विवेक शंकर आदेश ने टंकित तथा व्यविस्थत किया था। तृतीय अंक से त्रिपाठी जी ने इसकी कमान पूर्णतया स्वयं सँभाल ली और इसे उत्तरोत्तर विकासोन्मुख करते चले गए। मैंने  आरंभ के कई वषों तक  हिन्दी चेतना के लिए बहुत कुछ लिखा, जो प्रकाशित एवं प्रशंसित होता रहा । किन्तु, जब मैंने अनुभव किया अब हिन्दी चेतना को मेरी सहायता अथवा सेवा  की आवश्यकता नहीं है, मैंने पत्रिका में लिखना बंद कर दिया। त्रिपाठी जी ने कुछ विशेषांक भी प्रकाशित किए,  जिनमें दूसरा विेशेषांक श्याम त्रिपाठी जी के मेरे प्रति स्नेह तथा आदर का प्रतीक था। महाकवि हरि शंकर आदेश विशेषांक पर्याप्त रूप से चर्चित तथा प्रशंसित हुआ। उन्हीं दिनों मेरा ’महारानी दमयन्ती’ नामक महाकाव्य  भी प्रकाशित हुआ। त्रिपाठी परिवार ने जिस प्रेम श्रद्धा तथा  समारोहपूर्वक उसके विमोचन की व्यवस्था   की, वह स्तुत्य तथा सराहनीय थी। वह उत्सव आज तक मेरी स्मृति में अपने मौलिक रूप में बसा हुआ है।

हिन्दी चेतना एक ऐसी पत्रिेका है, जिसमें आरभ से ही मौलिक रचनाओं को स्थान दिया, जो आज भी वैसा ही बना हुआ है।  अन्य पुस्तकों अथवा पत्र-पत्रिकाओं से उद्धृत रचनाओं के आधार पर पत्रिकाओं का प्रकाशन करना सस्ती  पत्रिकारिता  के अंतर्गत आता। है  हिन्दी चेतना आरंभ से ही मौलिक रचनाओं तथा नए-नए साहित्यकारों को प्रोत्साहन देती रही है। आज हिन्दी चेतना केवल कनाडा की पत्रिका न रहकर विश्व की पत्रिका बन गई है। मुझे हर्ष है कि उनके मौलिक परामर्शदाताओं अथवा सह संपादकों में मेरी धर्मपत्नी डॉ0 निर्मला आदेश का नाम अभी तक बना हुआ है। मैं आज मृत्यु के महासागर के द्रुत गति से ढहते हुए एक दुर्बल कगार पर बैठा हुआ हूँ। अपने आई. सी.यू. कक्ष मे बैठा हुआ प्रभु से प्रार्थना कर रहा हूँ कि हिन्दी चेतना पत्रिका हिन्दी-संसार में नूतन चेतना लाती रहे। श्री श्याम त्रिपाठी तथा  श्रीमती सुरेखा स्वस्थ तथा दीर्घायु हों ! !

लोक -कल्याण की कामना करते हुए भारत एवं भारती का एक सूनु

महाकवि प्रो. हरि शंकर आदेश

(28 सितम्बर, 2018)

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आशीर्वाद

-महाकवि प्रो. हरि शंकर आदेश

बंधु! ‘ हिन्दी चेतना के अंक सकल अनूप।

लग रहे मानो हों हिन्दी के मनोहर स्तूप॥

यद्यपि हिन्दी का टोरॉन्टों में था प्रचुर प्रभाव।

किन्तु हिन्दी पत्रिका का था अत्यन्त अभाव॥

‘श्याम’ ने हिन्दी-जगत को दे नवल उपहार।

सुहृद हिन्दी प्रेमियों पर था किया उपकार॥

कर के ‘हिन्दी चेतना’ का प्रकाशन सोत्साह।

लेखकों- कव्यादि के उर में भरा उत्साह॥

नित्य नूतन ही हुआ इसका सदैव विकास।

बीस वर्ष व्यतीत हो गए, रच गया इतिहास।

शनैः शनैः बनी स्वतः ही अद्य अंतर्राष्ट्रीय।

‘श्याम-दम्पति’ का है कार्य सुश्लाघ्य औ’चिर स्मरणीय॥

है यही शुभकामना, शत-शत हैन आशीर्वाद।

हो प्रकाशित पत्रिका शत वर्ष तक निर्विवाद॥

हों’ सुरेखा-श्याम’चिरजीवी सुखी अक्लेश।

स्वस्थ रह, प्रमुदित रहें, करता विनय’ आदेश’॥

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